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आतंक को चुनौती

आतंकवाद से लड़ने में स्थानीय चौकसी और विश्व समुदाय की एकता कारगर सिद्ध हो रही है। हाल में बांग्लादेश के सहयोग से उल्फा के चेयरमैन अरविंद राजखोवा और एफबीआई की सूचना पर लश्करे-तैयबा के आतंकी टी. नजीर के पकड़े जाने से यही साबित हो रहा है। अरविंद राजखोवा करीब एक दशक से बांग्लादेश में पनाह लिए हुए था पर ऐसा आज ही क्यों हुआ।

दरअसल इस कामयाबी के पीछे भारत और बांग्लादेश के बेहतर होते संबंध और शेख हसीना सरकार द्वारा भारत की चिंताओं को गंभीरता से लेने की नीति का प्रमुख योगदान है। पिछले एक साल से उनके शासन में आने के बाद बांग्लादेश भारतीय उग्रवादियों का पहले जैसा पनाहगाह नहीं रहा। हसीना सरकार ऐसे कदम उठा रही है, जिससे या तो वे वहां से अपना कारोबार समेट कर भाग रहे हैं या पकड़े जा रहे हैं। उल्फा के मिलिट्री कमांडर परेश बरुआ के चीन या म्यांमार भागने के पीछे भी यह वजह बताई जा रही है। 

इस बीच रॉ जैसी भारतीय खुफिया एजंसियों का बांग्लादेश से सहयोग बढ़ा है, जिसके चलते यह सफलताएं मिल रही हैं। इसी अंतरराष्ट्रीय सहयोग का नतीजा है, बंगलुरू के इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस में 2005 में विस्फोट करने वाले टी. नजीर और उसके सहयोगी सिराज शम्सुद्दीन का पकड़े जाना। वे लोग बांग्लादेश की सीमा पार कर मेघालय आने के बाद  पकड़े गए। लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि हाल में अमेरिका में पकड़े गए आतंक डेविड हेडली से पूछताछ के बाद अमेरिका खुफिया एजेंसी एफबीआई ने बांग्लादेश को जो जानकारियां दीं, उसके आधार पर वे धरे गए।

तथ्य चाहे जो हों पर एक बात साफ है कि आतंकवाद के मुकाबले के लिए अमेरिका से बांग्लादेश तक सहयोग का एक नेटवर्क बन रहा है और उसी के नाते भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को अपना काम करने में आसानी हो रही है। सहयोग के इन्हीं वैश्विक सूत्रों के निर्माण के चलते ही हमारे गृहमंत्री यह दावा कर पा रहे हैं कि मुंबई हमले के बाद साल भर से भले कोई हमला न हुआ हो पर हमने एक दर्जन से ज्यादा बड़े हमलों की योजना को नाकाम किया है। दरअसल आतंकवाद धर्म और क्षेत्रीयता की स्थानीय विडंबनाओं के कारण शुरू होता है और सीमा पार के सहयोग से पनपता है। अगर उससे लड़ने वाले भी चौकसी और विवेक की वैसी ही समांतर संरचना का निर्माण कर लें तो कोई वजह नहीं कि आतंकवाद जारी रहे।

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