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एटमी हादसों से संभावित खतरे कौन लेगा जिम्मेदारी

केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 19 नवम्बर, 2009 को जिस असैन्य परमाणु दायित्व निर्वहन विधेयक को पारित किया गया, उसके पीछे सरकार की हड़बड़ी ने कई सवाल और विवाद पैदा कर दिए हैं। अमेरिका ने भले ही भारतीय परमाणु संस्थानों की अंतर्राष्ट्रीय निगरानी सुनिश्चित कराने के लिए भारत सरकार पर दबाव डाल कर राजी कर लिया हो, लेकिन इसके बावजूद अमेरिका और दुनिया के परमाणु संयंत्र आपूर्ति करने वाले देशों को दुर्घटना की दशा में भारी रियायत देकर अमेरिकी न्यूक्लियर लॉबी के दबाव के आगे आत्मसमर्पण भी माना जा रहा है।

भारत-अमेरिकी असैन्य परमाणु करार को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया के बीच भारत सरकार के इस कदम पर पूरी दुनिया के परमाणु रिएक्टर आपूर्तिकत्र्ता देशों की नजरें गड़ी हुई हैं ताकि भारत एटमी हादसों की स्थिति में क्षतिपूर्ति के संकट से काफी हद तक सुरक्षित रहे। कैबिनेट द्वारा पारित विधेयक में एटमी संयंत्रों में हादसे की स्थिति में मुआवजे की देनदारी अमेरिकी कंपनियों की नहीं, बल्कि भारत की उन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कंधों पर आ जाएगी जो भारत की सरजमीं पर इन सिविल परमाणु संयंत्रों को चला कर ऊर्जा पैदा करेंगे।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में जिस विधेयक के मजमून को कैबिनेट ने पारित किया, वह अपने आप में न केवल विवादास्पद है बल्कि भारत में भविष्य में होने वाले किसी भी परमाणु हादसे या अणु रिसाव से होने वाले जानमाल की क्षति की स्थिति में दोषी रिएक्टर आपूर्तिकर्ता कंपनी को कम से कम मुआवजे से साफ तौर पर अपनी गर्दन बचाने का मौका मिल सके।

इसमें कोई दोराय नहीं कि दुनिया में एटमी हादसों के दुष्परिणाम देशों की सीमाओं के बाहर जान माल को व्यापक तौर पर प्रभावित करते हैं, ऐसी सूरत में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु दायित्व निर्वहन के ऐसे ठोस प्रावधान की आवश्यकता होती है। इसके लिए हरेक देश को अपने यहां ऐसा कानून बनाना अनिवार्य होता है, जिससे हादसों की स्थिति पैदा होने पर अंतर्राष्ट्रीय बीमा मानदंडों का पालन किया जा सके।

चिंता की बात यह है कि असैन्य परमाणु रिएक्टरों के भावी हादसों पर क्षतिपूर्ति व दायित्व निर्वहन मात्र 2500 करोड़ तक सीमित कर दिया गया है। विशेषज्ञों की नजर में हादसों की भयावहता के लिहाज से यह बहुत ही कम राशि है जबकि एटमी हादसों में दुर्घटनाओं का पैमाना व्यापक व दूरगामी होता है। भोपाल त्रासदी में ही मानव तबाही का मुआवजा 2500 करोड़ से ज्यादा पहुंच चुका है, और फिर परमाणु हादसों या दुर्घटना का पैमाना तो औद्योगिक दुर्घटनाओं से कई गुना भयावह है। अगर किसी एक देश में एटमी दुर्घटना हुई तो दुनिया की जो भौगोलिक तस्वीर है उसमें करीब 20 देश एक साथ परमाणु दुर्घटना से होने वाले हादसों की लपेट में आ सकते हैं।

पहली बार जब परमाणु हादसों के विश्वव्यापी असर की बात सोची गई तो 1956 में ब्रिटेन में परमाणु हादसों में बीमा राशि का मानदंड तय हुआ था। हालांकि तब से अब तक पांच दशक से ज्यादा वक्त गुजर चुका है। दुनिया भर में अब आतंक का जो साया मंडरा रहा है, उसे देखकर लगता है कि सैन्य अथवा असैन्य परमाणु अस्त्र आतंकवादी तत्वों के हाथों तक पहुंच गए तो इससे होने वाले हादसे देशों की सीमाएं लांघ कर प्रलय की हदें पार कर सकते हैं।

बहरहाल, देश के ज्यादातर राजनीतिक दल और सांसद इस सच्चाई से पूरी तरह बेखबर नजर आते हैं कि कैबिनेट ने जो विधेयक पास किया उसके निहितार्थ क्या हैं। केन्द्र सरकार संसद के वर्तमान शीतकालीन सत्र में ही इस संशोधन विधेयक को मंजूरी दिलाने को बेताब है। भले ही औपचारिक विचार-विमर्श के लिए विधेयक को स्थाई समिति के सुपुर्द भी कर दिया जाए, लेकिन विधेयक पर संसद में सर्वानुमति प्राप्त कर पाना सरकार के लिए इतना आसान नहीं होगा।

गौरतलब है कि सन् 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु करार का विरोध करने वालों के पास यह सबसे बड़ा मुद्दा था कि असैन्य परमाणु करार के लिए भारत को बाध्य करने के लिए हरेक हथकंडा इस्तेमाल करने वाले अमेरिका ने पिछले 3 दशक से अपने यहां कोई परमाणु रिएक्टर स्थापित नहीं किया। ऐसी दशा में अमेरिकी रिएक्टर निर्माता व सप्लाई करने वाली कंपनियों के लिए मौजूदा भारत-अमेरिकी परमाणु करार चौपट पड़े रिएक्टर व्यापार को पुनर्जीवित करने के लिए बहुत बड़ा सौदा साबित हुआ।

एटमी करार साइन होने के बाद अमेरिकी कंपनियों की लॉबी इस बात के लिए तेज हो गई थी कि अंतर्राष्ट्रीय न्यूक्लियर दायित्व निर्वहन कनवेंशन के हिसाब से दुर्घटना मुआवजा जब तक एक सीमा में नहीं बांधा जाता तब तक करार को लागू नहीं किया जा सकता। कैबिनेट ने मुआवजा राशि को अमेरिकी कंपनियों के मनमाफिक कम करके साफ तौर पर परमाणु संयंत्रों की आपूर्ति और स्थापना में भारी मुनाफा कमाने का ख्वाब देख रही कंपनियों को दुर्घटना क्षतिपूर्ति से बड़ी राहत दी है।

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