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मानव स्वास्थ्य और रेडिएशन

हाल में कैगा परमाणु बिजली संयंत्र में रेडियोएक्टिव पदार्थ पानी में मिला दिए जाने की घटना के बाद वहां के 50 कर्मचारी बीमार पड़ गए। वे सभी रेडिएशन से होने वाले दुष्प्रभावों की चपेट में हैं। चिकित्सक उनके स्वास्थ्य पर नजर रखे हुए हैं। दरअसल, रेडिएशन मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। देश में कैंसर के बढ़ते मामलों की एक प्रमुख वजह भी रेडिएशन मानी गई है। लेकिन रेडिएशन के खतरों को लेकर आम लोगों में जागरुकता का अभाव है क्योंकि इसका खतरा प्रत्यक्ष नजर नहीं आता। रेडिएशन के अन्य खतरों में जन्म संबंधी विकार, रक्त संबंधी बीमारियां, त्वचा रोग प्रमुख हैं।  

क्या है रेडिएशन : ऊर्जा से निकलनी वाली एक्सरे, गामा रेज, अल्ट्रावायलेट आदि किरणें ही रेडिएशन हैं। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के अनुसार आमतौर पर 88 फीसदी रेडिएशन प्राकृतिक स्रोतों मसलन, सूर्य की रोशनी, भूमि से निकलने वाली ऊर्जा या कहीं-कहीं चट्टानों से निकलनी वाली गर्मी के कारण होता है। जबकि करीब 12 फीसदी रेडिएशन परमाणु बिजलीघरों या अन्य प्रतिष्ठानों, चिकित्सकीय उपकरणों तथा मोबाइल टावरों आदि से होता है। सूर्य के प्रकाश या भूमि से निकलने वाली ऊष्मा बहुत कम होती है, इसलिए इस रेडिएशन का खतरा मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत कम है। 

किसको है रेडिएशन का खतरा ?
रेडिएशन का सबसे ज्यादा खतरा इससे संबंधित उपक्रमों में कार्य करने वाले लोगों को होता है। मसलन, एक्सरे, सीटी स्कैन मशीनों में रेडियोएक्टिव मैटीरियल इस्तेमाल होते हैं जिनसे रेडिएशन पैदा होता है। कैंसर अस्पतालों में रेडिएशन थेरेपी से उपचार होता है। 

दूसरे, न्यूक्लीयर पावर प्लांटों में कार्य करने वालों और इनके आसपास रहने वाले लोगों को इनसे उत्सर्जित होने वाले रेडिएशन से खतरा है। हालांकि ऐसे प्लांटों में रेडिएशन रोकने के लिए कड़े उपाय किए जाते हैं। इसके अलावा कुछ और उद्योगों में भी परमाणु सामग्री इस्तेमाल होती है जिससे भारी मात्र में रेडिएशन होता है। इसलिए इनसे जुड़े लोग ‘पेशेवराना खतरे’ में हैं।

चिंताजनक तथ्य यह है कि देश भर में करीब 50 हजार से भी ज्यादा एक्सरे यूनिट कार्य कर रही हैं। इतनी ही तादाद में सीटी स्कैन और अन्य विकिरण वाले डायग्नोस्टिक उपकरण हैं। नियमानुसार इन यूनिटों को आवासीय इलाकों में नहीं होना चाहिए, लेकिन इनमें से आधी यूनिट आवासीय इलाकों में धड़ल्ले से चल रही हैं तथा उनमें विकिरण की रोकथाम के भी उपाय नहीं हैं। इसलिए इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि कितने लोग विकिरण से होने वाली बीमारियों के खतरे की जद में हैं। मोबाइल फोन टावर ने भी आम लोगों के लिए रेडिएशन का खतरा बढ़ा दिया है।

कितना खतरा ?
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूक्लीयर मेडिसिन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर प्रतीक कुमार के अनुसार यदि 100 लोगों को एक-एक मिली सीवर्ट (मिलीरेम) रेडिएशन दिया जाए तो अधिकतम इनमें से पांच लोगों को कैंसर होने के आसार रहते हैं। प्रोफेसर कुमार के अनुसार लेकिन जब चिकित्सा में विकिरण का इस्तेमाल होता तो यह मात्र एक मिली सीवर्ट से बहुत कम रखी जाती है। रोगी को उपचार के लिए सिर्फ एक माइक्रो सीवर्ट रेडिएशन दिया जाता है। माइक्रो सीवर्ट का मतलब है एक मिली सीवर्ट का लाखवां हिस्सा। अब यदि कैंसर होने की 5 फीसदी की आशंका की गणना की जाए तो यह लगभग नगण्य रह जाती है। इसलिए इसके उपचार के फायदे हमारे लिए कहीं ज्यादा हैं। दूसरे अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति साल में अधिकतम 20 मिली सीवर्ट रेडिएशन से डोज लेता है तो इससे उसके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव लगभग नगण्य हैं।

कैसे होती है जांच ?
प्रोफेसर कुमार के अनुसार रेडिएशन की जांच के लिए रेडिएशन मॉनीटर होता है। जब भी किसी व्यक्ति को उपचार के लिए रेडिएशन से गुजरना होता है या फिर किसी ऐसे प्रतिष्ठान में काम करता है, जहां रेडिएशन होता है तो उसे यह उपकरण साथ रखना होता है। इस मीटर के आंकड़ों की स्टडी परमाणु ऊर्जा नियामक एजेंसी द्वारा की जाती है। यदि कहीं विकिरण ज्यादा हो रहा होता है तो उसे कम किया जाता है। एक रोचक तथ्य, कैंसर अस्पतालों या परमाणु प्रतिष्ठानों में कार्य करने वाले हर व्यक्ति की रेडिएशन डोज का रिकार्ड रखा जाता है। ऐसा पेशेवर दुनिया में कहीं भी कार्य करे उसे रेडिएशन डोज के आंकड़ों का ब्यौरा भी सार्टिफिकेट आदि की तरह साथ लेकर जाना होता है।

यदि कोई रेडियोएक्टिव पदार्थ खा ले तो ?
ऐसी स्थिति घातक हो सकती है। हालांकि ऐसे मामले बहुत कम प्रकाश में आते हैं, लेकिन दुर्घटनावश ऐसे मामले होते रहते हैं। कुछ रेडियोएक्टिव पदार्थ मल के साथ बाहर निकल आते हैं तथा कुछ शरीर में जम जाते हैं। यदि कोई वस्तु शरीर में जमा हो जाए तो इसमें ज्यादा खतरा है। यदि वह मल के जरिए निकल जाए तो भी जब तक यह प्रक्रिया पूरी होती है तब तक रेडियोएक्टिव पदार्थ शरीर को काफी नुकसान पहुंचा देता है। ऐसे में डाक्टरों की कोशिश होती है कि रोगी का पेट खाली कराया जाए। इसका प्रभाव उल्टी होना, डायरिया और नाक में संक्रमण जैसे होते हैं। दूरगामी प्रभावों में कैंसर, जन्म संबंधी विकार, त्वचा संबंधी रोग हो सकते हैं। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, वृद्धों के लिए यह खतरे ज्यादा होते हैं।

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