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पत्थर तोड़ने वालियाँ बनीं खदानों की मालकिन

‘खुदी को कर बुलंद इतना कि तकदीर पहले खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है।’ पाठा क्षेत्र की उन अनपढ़ महिलाओं को तो इस शेर का मतलब भी नहीं पता होगा लेकिन महिलाओं ने ऐसा कारनामा कर दिखाया कि खनन माफिया भी दंग रह गए। अब इन सैकड़ों महिलओं ने छह स्थानों पर खनन का पट्टा भी ले लिया है। खुद भी पत्थर तोड़ रही हैं और सैकड़ों हाथों को काम भी दे दिया है।

यमुनापार के पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकांश गरीब परिवार सदियों से पत्थर तोड़कर अपने परिवार का गुजारा करते आ रहे हैं। पत्थर की खदानों में काम करने वाली गरीब महिलाओं को ठेकेदारों द्वारा मानसिक, आर्थिक और शारीरिक शोषण भी किया जाता रहा है। इन महिलाओं के पति की सारी कमाई शराब में चली जाती है। इसलिए बच्चों का पेट भरने के लिए इनका अपना शरीर भी बेचना पड़ता था। इस शोषण से आजिज आ चुकी जसरा, शंकरगढ़ और कोराँव विकास खंड के एक दजर्न गाँवों की गरीब महिलाओं ने दो साल पहले खनन का पट्टा लेने का विचार किया क्योंकि माफिया ठेकेदार इन गरीबों के नाम पर ही खनन का पट्टा लेकर लाखों रुपये कमा रहे थे।

इन तीनों विकास खंडों के सोनबरसा, छतहरा, छिड़ी, बसहरा, पूरे बैजनाथ व सीध टीकर गाँव की लगभग दो सौ महिलाओं ने छह समूहों का गठन खनन पट्टे के लिए आवेदन किया। इनके आवेदन करते ही ठेकेदारों में खलबली मच गई। ठेकेदारों ने इनके पतियों को बहला फुसला कर अपने पक्ष में कर लिया। फिर महिला समाख्या की जिला इकाई के कार्यकर्ताओं ने इन महिलाओं को उनका हक दिलाने में मदद की। सोनबरसा गाँव में गठित महिला समूह का नेतृत्व कर रहीं गीता बताती हैं कि पट्टा लेने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा।

महिला के साथ गरीब होने की वजह से लोग दूसरी ही निगाह से देखते हैं। कोई कर्मचारी बात करने को ही नहीं तैयार था। हर जगह पैसे की माँग की जा रही थी। फिर कई गाँवों में समूह का गठन कर महिलाओं को एकजुट किया गया। छिड़ी गाँव की माधुरी तो पट्टे की कहानी सुनाते हुए फफक पड़ती है। वह बताती है कि किस तरह लोग फब्तियाँ कसते थे।

पूरे बैजनाथ की श्रीमती रानी व ममता ने बताया कि पट्टे लेने के लिए समूह द्वारा इकट्ठा किया धन काफी कम पड़ गया। इसके बाद कई महिलाओं ने अपने गहने भी बेच दिए। इससे घर के मर्द भी इन महिलाओं के खिलाफ हो गए। फिर महिला समाख्या की जिला कार्यक्रम समन्वयक श्रीमती मीनाक्षी सिंह के प्रयास से सभी फाइलें तैयार हो गईं। जब सब कुछ फाइनल हो गया तब भी गरीब महिलाएँ डरती हुई खनन कार्यालय पहुँचीं।

वहाँ कई खनन माफिया खड़े थे। इनको देखते ही गरीब महिलाओं की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। इसी दौरान पता चला कि छह महिला समूहों को खनन का पट्टा दे दिया गया है। यह पट्टा सितम्बर 2008 में मिल गया लेकिन कई महीनों तक ठेकेदार अड़चन डालते रहे। पिछले दो माह से महिलाएँ सोनबरसा, छतहरा, छिड़ी, बसहरा, पुरे बैजनाथ, तथा सीध टिकर गाँवों में मिले खनन के पट्टे पर खनन करवा रही हैं।

इन समूहों की लगभग दो सौ महिलाओं को तो रोजगार मिला ही है। इन महिलाओं ने सैकड़ों और परिवारों को भी काम दे दिया है। इन महिला समूहों की खदानों में आसपास के तमाम परिवार काम रहे हैं। इन महिलाओं की अगुवाई कर रही सीध टिकट ग्राम पंचायत की द्रौपदी तथा बसहरा की सुनीता व गीता ने बताया कि अब छह समूहों के प्रयास से आटा चक्की, तेल की मशीन तथा मिनी राइस प्लांट लगाने की भी योजना है।

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