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अधिक खुले दिमाग के हो गये हैं लोग: पं रविशंकर

अधिक खुले दिमाग के हो गये हैं लोग: पं रविशंकर

प्रसिद्ध सितार वादक पंडित रविशंकर ने आज कहा कि वह हमेशा ऐसा कुछ नया करने की कोशिश करते हैं जिसकी पूरी दुनिया के लोग सराहना कर सके । उन्होंने माना कि उनके समय की अपेक्षा आजकल शास्त्रीय संगीत के परिप्रेक्ष्य में लोग काफी खुले दिमाग के हो गये हैं।

राजधानी में एक कार्यक्रम में शिरकत करने आये पंडित रविशंकर ने कहा, पहले की तुलना में आजकल लोग काफी खुले दिमाग के हो गये हैं, जब मैंने शास्त्रीय संगीत बजाना शुरू किया था उस वक्त लोग काफी पारंपरिक सोच वाले होते थे।

उन्होंने कहा, आज भी लोग आपको यह कहते हुए मिल जायेंगे कि पूरी रात शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति होनी चाहिए तभी असली मजा आता है। लेकिन यह किसी भी दष्टि से वैज्ञानिक और तर्कसंगत नहीं हैं। एक संस्मरण सुनाते हुए उन्होंने कहा, कोलकाता में शास्त्रीय संगीत के कंसर्ट की प्रस्तुति के दौरान मेरा नंबर रात में चार बजे आया। मैंने सितार बजाना शुरू किया और अचानक आंखे खोलकर देखा तो कुछ लोग झपकियां ले रहे थे।

पंडित जी ने बताया कि इसके बाद एक प्रशंसक आया और कहने लगा दादा आज आपने आलाप को प्रस्तुत नहीं किया। मुझे हंसी आ गयी और मैंने कहा कि जब आप सो रहे थे उस वक्त मैं आलाप ही प्रस्तुत कर रहा था। पंडित रविशंकर ने कहा, सबसे पहले मैंने ही सही क्षमता के माइक्रोफोन के साथ प्रस्तुति देना शुरू किया और मैं केवल डेढ़ घंटे में ही कंसर्ट खत्म कर देता था। मैं जहां जाता हूं वहां के श्रोताओं के हिसाब से बजाता हूं ताकि लोग शास्त्रीय संगीत को समझ सके।

पंडित रविशंकर को शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति की नयी शैली के लिए जाना जाता है। उन्होंने कहा कि उस वक्त शास्त्रीय संगीत से जुड़े लोगों और समीक्षकों ने कहना शुरू कर दिया था कि रविशंकर शुद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत नहीं बजाते हैं। फ्यूजन के बारे में उन्होंने कहा, लोक संगीत और वायलिन सहित काफी प्रयोग करता रहता हूं और इसमें बुराई क्या है। रचनात्मकता का मुक्ष पर काफी प्रभाव पड़ा है। मैं हमेशा कुछ नया करने की कोशिश करता रहता हूं जो पूरी दुनिया के संगीत के लिए बेहतर हो।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत खत्म नहीं हो रहा है बल्कि इसकी प्रस्तुति में अंतर आ रहा है और पहले की तुलना में आजकल शास्त्रीय संगीत में भी गति आ गयी है। फिल्म संगीत के बारे में उन्होंने कहा कि इसमें काफी विभिन्नताएं हैं जिसमें राग और ताल को लेकर काफी प्रयोग किए गए हैं। जिसको लोग काफी पसंद करते हैं और उन्हें भी राग पर आधारित गाने सुनने में काफी मजा आता है।

शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में आने वाले युवाओं को संदेश देते हुए पंडित रविशंकर ने कहा कि नये लोग शास्त्रीय संगीत अच्छे गुरू के सानिध्य में सीखें और गुरू को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि शार्गिद में प्रतिभा है या नहीं। प्रतिभा सबसे अहम होती है और प्रतिभा और शौक दोनों अलग चीजें होती हैं। उन्होंने कहा कि शार्गिद ध्यान रखे कि पॉप म्यूजिक जल्दी लोकप्रिय कर देता है लेकिन शास्त्रीय संगीत के लिए साधना की जरूरत होती है।

अपने ढेर सारे संस्मरण सुनाते हुए पंडित जी ने कहा कि लता मंगेशकर के एलबम सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा में उन्होंने संगीत दिया था, लेकिन रिकार्ड में उनका नाम नहीं दिया गया था। ऐसी स्थिति के लिए भी शास्त्रीय संगीतज्ञ को तैयार रहना चाहिए।

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