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2020 तक उत्सर्जन में 25 फीसदी कमी करेगा भारत

2020 तक उत्सर्जन में 25 फीसदी कमी करेगा भारत

कोपेनहेगन सम्मेलन में भारत के रूख को लेकर छाए संशय के बादलों को दूर करते हुए सरकार ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि वह उत्सर्जन कटौती के मामले में अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत किसी भी कानूनी बाध्यता को स्वीकार नहीं करेगी लेकिन खुद की पहल पर देश अपने उत्सर्जन तीव्रता में 2020 तक 20 से 25 प्रतिशत तक की कमी कर सकती है।
    
लोकसभा में जलवायु परिवर्तन पर नियम 193 के तहत हुयी चर्चा का जवाब देते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि भारत कोपेनहेगन सम्मेलन में पूरे लचीले रूख के साथ जाएगा लेकिन इस लचीलेपन के तहत वह उत्सर्जन कटौती से संबंधित किसी कानूनी बाध्यता को स्वीकार नहीं करेगा। साथ ही वह उत्सर्जन में वृद्धि के 'पीक ईयर' तय करने के लिए राजी नहीं होगा।
  
रमेश ने बताया कि कोपेनहेगन में आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल में स्कूल और कालेज के चार छात्रों को भी ले जा रहे हैं ताकि दुनिया यह समझ सके कि भारत अपनी भावी पीढ़ी को बेहतर जलवायु देने के लिए कितना गंभीर है।

उन्होंने कहा कि भारत कोपेनहेगन में अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत कानूनी बाध्यता वाले उत्सर्जन कटौती के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा लेकिन देश के हितों का ख्याल रखते हुए घरेलू कानून के तहत उत्सर्जन कटौती के लिए कई कदम उठाएगा। इन कदमों में दिसंबर 2011 तक सभी वाहनों के संदर्भ में अनिवार्य उत्सर्जन मानक बनाना, देश के पैमाने पर प्रदूषणमुक्त आदर्श भवन संहिता तथा उद्योगों के लिए ऊर्जा दक्षता प्रमाणपत्र के लिए कानून में संशोधन शामिल हैं।

रमेश ने कहा कि इसके अलावा देश के मौजूदा वन क्षेत्र को भी कायम रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि देश में भविष्य में स्थापित होने वाले सभी कोयला आधारित ताप बिजलीघरों में 50 प्रतिशत प्रदूषणरहित कोयले पर आधारित होंगे।
     
उन्होंने कहा कि भारत उक्त सारे कदम किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत किसी कानूनी बाध्यता के बिना उठा रहा है लेकिन कोपेनहेगन सम्मेलन अगर सफल होता है और बराबरी के आधार पर समझौता किया जाता है तो भारत अपनी ओर से उत्सर्जन तीव्रता में 25 प्रतिशत से भी अधिक कटौती करने पर विचार कर सकता है।
    
रमेश ने साफ शब्दों में कहा कि उत्सर्जन तीव्रता में कटौती के लिए भारत द्वारा घरेलू स्तर पर उठाए जाने वाले कदमों और इस मामले में अंतरराष्ट्रीय दबाव को एक साथ मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए।
     
उन्होंने कहा कि भारत यह कदम इसलिए उठा रहा है कि वह जानता है कि भविष्य में होने वाले जलवायु परिवर्तन से मालदीव, इंडोनेशिया या अमेरिका से कहीं अधिक प्रभावित भारत होगा।
    
रमेश ने कहा कि उत्सर्जन कटौती के मामले में चीन, ब्राजील और इंडोनेशिया पहले ही घोषणा कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में भारत पर दबाव है लेकिन हम किसी भी किसी भी दबाव के चलते उत्सर्जन कटौती की घोषणा नहीं करेंगे। उत्सर्जन कटौती के संबंध में रमेश ने बताया कि 12वीं पंचवर्षीय योजना कम कार्बन वाले उत्सर्जन पर आधारित होगी। उन्होंने कहा कि भारत द्वारा उत्सर्जन कटौती में लचीला रूख अपनाए जाने का समर्पण नहीं माना जाए और देश अपने हितों की पूरी रक्षा करेगा।

भारत ने 2030 तक 2005 की तुलना में 37 फीसदी उत्सर्जन में कमी की बात कही है। उन्होंने कहा कि विभिन्न मंत्रालयों से सहमति बनने के बाद ही सरकार ने इसका निर्धारण किया है।

इस लक्ष्य को पाने के लिए राज्य सरकारों से भी अहम भूमिका निभाने के लिए कहा गया है। राज्य सरकारों से स्थानीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए नीति निर्माण करने के लिए कहा गया है, ताकि राष्ट्रीय उत्सर्जन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।

रमेश ने कहा कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए राज्य सरकारों को जरूरी मदद मुहैया कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन के साथ मिलकर स्थानीय स्तर पर जलवायु पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी शुरू किया जा चुका है। हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कनाडा यात्रा के दौरान सतत विकास के लिए पर्यावरण अनुकूल तकनीकी की इच्छा जताई थी, जिसके तहत छह दिसंबर को कनाडा एक क्लीन टेक्नोलॉजी ट्रेड मिशन भारत भेजेगा।

चीन, अमेरिका, रुस के बाद भारत चौथा सबसे बड़ा उत्सर्जनकर्ता देश है। चीन का स्थान पहला और अमेरिका दूसरे स्थान पर है। अमेरिका और चीन ने पहले ही कोपेनहेगन सम्मेलन से पहले उत्सर्जन में कमी के अपने लक्ष्य की घोषणा कर दी है।


बड़े उत्सर्जनकर्ता देशः-
                        कार्बन उत्सर्जन    1990 के बाद       प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन
                           (मेगा टन)        (% परिवर्तन)
1. चीन-               6103.50            152                       4.62
2. अमेरिका-        5975.10            18.1                19.70
3. रुस-                1577.69           -36.8                  11.00
4. भारत-            1510.35          118.70               19.70
5. कनाडा-             560.39            22.9                  17.20
6. ब्रिटेन-              557.86            -5.5                     9.20

चीन को क्या है नुकसान

जलवायु परिवर्तन को लेकर चीन सरकार का रवैया चाहे कुछ भी हो, लेकिन चीन के मौसम विज्ञानी भी बढ़ते तापमान को चीन के लिए खतरा मानते हैं।

मौसम विज्ञानियों का मानना है कि अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो चीन को आने वाले समय में काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए चीन सरकार को इसे टालने के बजाय जलवायु परिवर्तन के लिए किए जा रहे वैश्विक प्रयासों को तेज करने की कोशिश करनी चाहिए।

चीन के मौसम विज्ञान के प्रमुख वैज्ञानिक झेंग गुओग्वांग ने कम्युनिस्ट पार्टी की पत्रिका `सीकिंग ट्रुथ' में यह चेतावनी दी। यह पत्रिका कोपेनहेगन सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले प्रकाशित की गई है।

चीन के ग्रीनपीस कार्यकर्ता यांग एलुन ने कहा भी कहा कि चीन के लिए कठोर कदम उठाना बेहद जरूरी है। यांग ने कहा कि चीन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करने वाला सबसे बड़ा देश है, ऐसे में उत्सर्जन में कमी लाने में उसकी भूमिका अहम होगी।

झेंग ने अपने लेख में लिखा है कि आने वाले 50 वर्षों में चीन का अनाज उत्पादन 37 फीसदी तक कम हो जाएगा, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने कहा कि अगर आने वाले 5 वर्षों में प्राकृतिक आपदाएं ऐसी ही बढ़ती रहीं तो देश की आर्थिक और सामाजिक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इससे देश के वार्षिक अनाज उत्पादन में 30 से 50 फीसदी तक गिरावट आ सकती है। जलवायु परिवर्तन से सूखे और बाढ़ की घटनाएं और बढ़ेंगी और देश की स्थिति और भी बदतर हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में ही जलवायु परिवर्तन से अनाज उत्पादन में 10 से 20 फीसदी तक अंतर पड़ा है। उन्होंने कहा कि चीन को ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए अहम हिस्सेदार बनना चाहिए ताकि देश की कृषि और खाद्य सुरक्षा को बचाया जा सके।

गौरतलब है कि चीन जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित देशों को जिम्मेवार बताता रहा है। चीन हमेशा से मांग करता रहा है कि विकसित देशों को जलवायु परिवर्तन की जिम्मेवारी लेते हुए उत्सर्जन पर नियंत्रण करना चाहिए।

'जलवायु परिवर्तन पर चीनियों से अधिक फिक्रमंद भारतीय

डेनमार्क के कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन के मसले पर शुरू होने जा रहे वैश्विक सम्मेलन से ऐन पहले कराए गए एक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार धरती के बढ़ते तापमान पर 67 प्रतिशत भारतीय चिंतित हैं जबकि चीन में ऐसे लोगों की संख्या महज 30 प्रतिशत है।

पीयू रिसर्च सेंटर की ओर से कराए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार धरती के बढ़ते तापमान को लेकर विभिन्न देशों की जनता की अलग-अलग राय है। यह सर्वेक्षण 18 मई से 16 जून के बीच कराया गया। इसके अनुसार प्रदूषण में अहम योगदान देने वाले तीन प्रमुख देशों अमेरिका, रूस और चीन के लोगों में इस मसले पर अन्य देशों की अपेक्षाकृत कम चिंता है।

धरती के बढ़ते तापमान को लेकर सबसे ज्यादा चिंता ब्राजीलवासियों को है। सर्वाधिक 9० प्रतिशत ब्राजीलवासी इससे चिंतित हैं, तो फ्रांस के 68 प्रतिशत और भारत के 67 प्रतिशत लोग इसे लेकर परेशान हैं।

जलवायु परिवर्तन के मसले पर जापान के 65 प्रतिशत, स्पेन के 61 प्रतिशत, जर्मनी के 60 प्रतिशत लोग चिंतित हैं। इसके विपरीत अमेरिका और रूस के महज 44 प्रतिशत और चीन के 30 प्रतिशत लोगों को ही गर्माती धरती को लेकर परेशानी है। इजरायल और केन्या के 48 प्रतिशत, कनाडा के 47 प्रतिशत, तो इंडोनेशिया के 44 प्रतिशत लोग इस बारे में चिंतित हैं।

हरेक देश के बहुसंख्य लोगों का मानना है कि बढ़ता तापमान एक गंभीर समस्या है लेकिन महज 15 से 25 देशों के ही बहुसंख्य लोग इस समस्या को बेहद गंभीर मानते हैं। इसके अलावा 23 से 25 प्रतिशत देशों के बहुसंख्य लोगों का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण को आर्थिक विकास की धीमी गति और नौकरियों में कटौतियों के बावजूद अहमियत दी जानी चाहिए।

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