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इस हकीकत के ताले तोड़ने होंगे

ग्लोबल वार्मिग और पर्यावरण के प्रदूषण के मुद्दे हरेक की जुबान पर हैं। यहां तक कि कानपुर जैसे शहर की सड़कों पर चलने वाले अपनी पान और पान मसाले की पीक को दूर तक थूकने की होड़ को जारी रखते हुए, इस पर अपनी चर्चा जारी रखते हैं। कुछ ही दिनों में इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर डेनमार्क की राजधानी, कोपनहेगन में संयुक्त राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी शुरू हो जाएगा। ग्लोबल वार्मिग का सबसे अधिक प्रभाव उन गरीब देशों पर पड़ेगा, जिनका बड़ा भूभाग समुन्दर के तट पर है।

हमारा देश बहुत विशाल है, उसका बड़ा हिस्सा समुन्दर के तट पर है। मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, तिरुवनन्तपुरम जैसे महानगर भी समुन्दर के किनारे बसे हैं। बंगाल का मुर्शिदाबाद जिला और सुन्दर वन इलाका हर साल कई किलोमीटर का अपना भू-भाग समुन्दर के हवाले कर देता है। लेकिन सरकार और जनता के बड़े हिस्सों के रवैये से ऐसा लगता नहीं कि उन्हें इस खतरे का जरा भी एहसास है।

इसे कई बार दोहराया जा चुका है कि दुनिया में प्रदूषण फैलाने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा धनाढय़ और विकसित देशों के कंधों पर ही रखी जानी चाहिए। जितना उनका जीवन स्तर ऊंचा होता जाता है उसी अनुपात में उनके द्वारा पैदा प्रदूषण भी बढ़ता है। उनके खान-पान, ऐशोआराम, रहन-सहन, औद्योगिक प्रगति और यातायात के साधनों के कारण ही ओजोन लेयर प्रभवित हुई है।

विकसित देश अब यह कहने लगे हैं कि उनकी जिम्मेदारी अपनी जगह है, लेकिन अब दुनिया में सबसे तेजी के साथ प्रगति करने वाले, सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश- भारत और चीन भी प्रदूषण के बड़े कारण बनते जा रहे हैं। बात कुछ हद तक सही है, लेकिन आज भी अमेरिका के 10 फीसदी सबसे गरीब लोग भारत के 10 फीसदी सबसे अधिक पैसेवालों से दुगुना प्रदूषण फैलाते हैं।

दुनिया के पर्यावरण की हालत को सुधारने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदारी अमेरिका को ही लेनी होगी, लेकिन वह ऐसा करने के लिए तैयार नहीं है। अमेरिका के नेता और बुद्धिजीवी बड़ी सफाई से अपनी नीयत को समय-समय पर स्पष्ट करते रहे हैं। राष्ट्रपति बुश, जो अमेरिका के तेल उद्योग के हितों के साथ जुड़े हुए थे, ने बेबाक तरीके से कहा था कि अमेरिका अपने रहन-सहन का स्तर पर्यावरण के नाम पर कतई बदलने को तैयार नहीं है।

यही कारण है कि अमेरिका ने क्वेटो सम्मेलन में पारित करार पर दस्तखत करने से साफ इंकार कर दिया था। उस करार के अनुसार, विकसित देशों ने अपने द्वारा पैदा किए जाने वाले प्रदूषण (कार्बन एमिशन) पर रोक लगाने का फैसला किया था और उसमें यह भी माना गया था कि विकासशील देशों में प्रदूषण घटाने के लिए विकसित देश उनकी आर्थिक मदद करेंगे। यूरोप के देशों ने कुछ हद तक इस करार को लागू करने का काम किया है, लेकिन अमेरिका के साफ इंकार करने के बाद, इसका असर बहुत घट गया है।

अब फिर से कोशिश की जा रही है कि कोपेनहेगन में अमेरिका और विकसित देशों पर दबाव बनाया जाए कि वह अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करें। लेकिन कोशिश को भारत की सरकार ने अचानक अपना पैंतरा बदलकर काफी नुकसान पहुंचा दिया है। भारत सरकार ने ‘व्यवहारिक’ बन जाने का फैसला कर लिया है। ‘व्यवहारिक’ बनने का मतलब है, उतने पर ही जोर देना, जितना अमेरिका मानने को तैयार हो। अगर किसी को इन बातों पर शक हो तो उन्हें हाल में बैंकाक में हुई कोपनहेगन सम्मेलन की तैयारी बैठक पर गौर करना चाहिए। जब भारत के प्रतिनिधि ने अपने देश के दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया तो वहीं मौजूद अमेरिका के प्रतिनिधि ने उन्हें टोकते हुए कहा- यह पुरानी बात है, अब आपकी सरकार का दृष्टिकोण बदल गया है।

ग्लोबल वार्मिग और प्रदूषण के खतरों का सामना सरकार को नहीं, आम नागरिकों को करना पड़ेगा। हमारे देश की बहुमत जनता धरती को वसुन्धरा के रूप में, पहाड़ों को देवलोक के रूप में और नदियों को देवियों के रूप में पूजती है। इसका नतीजा तो यह होना चाहिए कि इन पवित्र स्थानों को हर तरह के प्रदूषण से बचाना उस बहुमत जनता को अपना पवित्र, धार्मिक कर्तव्य मानना चाहिए, लेकिन वस्तुस्थिति तो इसके काफी परे है।

धरती, पहाड़ों और नदियों को बचाने के लिए, विभिन्न सरकारों ने बड़े शहरों में बिजली से चलने वाले श्मशान-घर बनवाए हैं। इन भट्ठियों को बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है और एक बार अगर भट्ठी ठंडी हो जाती है तो उसे फिर से पर्याप्त मात्र में गरम करने में घंटों लग जाते हैं। इसीलिए, इन श्मशान घरों की भट्ठियों को 24 घंटे बिजली उपलब्ध करवाई जाती है। वाराणसी, कानपुर और इलाहाबाद गंगा पर बसे तीन बड़े शहर हैं जहां इस तरह के श्मशान घरों को उपलब्ध करवाया गया है। तीनों जगहों पर कोसों दूर से लोग अपने अपने दिवंगत सगे-संबंधियों के दाह-संस्कार के लिए आते हैं ताकि गंगा की पावन धारा में उनकी राख को बहाकर उनके लिए स्वर्ग में स्थान सुनिश्चित कर दे। दुर्भाग्यवश, राख की जगह अक्सर अधजली लाशों को ही गंगाजी के सुपुर्द कर दिया जाता है।

कई विद्वानों, और धार्मिक मामलों के विशेषज्ञों का मनना है कि अंतिम संस्कार के लिए पार्थिव शरीर को लकड़ी से जलाने की कोई अनिवार्यता नहीं है। मंत्रोचारण के साथ उसका जलना अनिवार्य है तो यह बिजली के श्मशान घर में भी संभव है। लेकिन कानपुर के बिजली श्मशान घर में तो ताला लगा हुआ है। निहित स्वार्थो और अंधविश्वास का ऐसा जबरदस्त गठजोड़ है कि किसी में इस ताले को तोड़ने की हिम्मत ही नहीं है।

बिजली द्वारा संचालित श्मशान घर का माहौल दिल्ली में देखने को मिल जाता है, जहां कुछ बड़े लेखकों, बुद्धिजीवियों, समाज सुधारकों और उदारवादी नेताओं के मरने से पहले अपनी इच्छा जाहिर की थी कि उनके अंतिम संस्कार यहीं सम्पन्न किए जाने चाहिए। उनकी देखा-देखी में अन्य लोगों ने भी ऐसी इच्छा व्यक्त करने की हिम्मत जुटा ली है। श्मशान घर का वातावरण शांति और गंभीरता का है। लोग धीमे स्वरों में बात करते हैं, एक दूसरे को सांत्वना देते हैं, अपने दुख का इजहार करते हैं। घाटों के कोलाहल की कल्पना भी यहां नहीं की जा सकती। दाह-संस्कार समाप्त होने के बाद नगर महापालिका की रसीद भी मिलती है- 20 साल पहले 25 रु. की मिलती थी, अब शायद 100 रु. की मिलती होगी। कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी में बड़ी संख्या में वैज्ञानिक सोच के बुद्धिजीवी रहते हैं। यहां गंगा से प्रेम करने वाले भी अनगिनत है लेकिन यथास्थिति के ताले को तोड़ने की हिम्मत कोई जुटा नहीं पा रहा है।

लेखिका अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की अध्यक्ष हैं

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