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स्विट्जरलैंड : मीनारों पर एतराज क्यों

‘मस्जिदें हमारी बैरक हैं/ गुंबद हमारी हेल्मेट/ मीनारें हमारी बेनट हैं/ और हमारे विश्वस्त सिपाही...' स्विट्जरलैंड में मस्जिद की मीनारों पर प्रतिबंध के बारे में चर्चा से पहले तुर्की के प्रधानमंत्री रिसेप तैयप एर्दोआन की लिखी इस कविता को याद करने की कई सारी वजह हैं।

तीन नवम्बर 2002 के आम चुनाव में रिसेप तैयप एर्दोआन की ‘एकेवी’ अदालेत वे कल्किन्मा पार्तिसी (अदालत व विकास पार्टी) को पहली बार जबरदस्त जीत हासिल हुई थी। वे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते, उससे पहले ही वे दस माह के लिये जेल भेज दिये गये। कारण रिसेप की वह कविता थी, जिसे सेक्युलर तुर्की की अदालत को रास नहीं आई। पांच माह बाद रिसेप तैयप एदरेआन जेल से छूटे, और फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। कविता का ऐसा ‘साइडइफेक्ट’ पहली बार देखने को मिला।

मस्जिद की मीनारें एक बार फिर बीच बहस में हैं। लेकिन इस बार मुसलमान बहुल धर्मनिरपेक्ष देश तुर्की में नहीं, बल्कि उससे बहुत दूर ईसाई बहुल स्विट्जरलैंड में इसे लेकर माहौल गर्माया हुआ है। ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ विषय पर बहस से थके जो विद्वान लंबे समय से विश्रम कर रहे थे, स्विस मतदाताओं के फैसले ने उन्हें जगा दिया है।
स्विट्जरलैंड में कोई भी कानून लागू करने या संविधान में परिवर्तन के लिए जनता के बीच मतसंग्रह जरुरी है। 30 नवम्बर को 20.67 लाख वोटरों के बीच मतसंग्रह कराया गया कि उनके देश की मस्जिदों में मीनारें होनी चाहियें, या नहीं। इस संजीदा सवाल पर 57.5 प्रतिशत स्विस जनता ने मत दिया कि मस्जिदों की मीनारें नहीं दिखनी चाहिए।
जेनेवा, जहां कि यूएन का दूसरा मुख्यालय है, वहां तो 60 प्रतिशत लोगों ने मीनारों के विरोध में वोट दिया। लेकिन इसका प्रतिरोध 26 में से चार र्केटनों (प्रांतों) में हुआ। ये चार वे र्केटन हैं, जहां पर 1990 में युगोस्लाविया में छिड़े युद्ध से उजड़े हुए मुसलमान आकर बस गये थे। बाकी तुर्की, बाल्कन और दूसरे देशों से आये मुसलमान हैं। स्विटजरलैंड की 75 लाख आबादी में छह प्रतिशत मुसलमानों को आबोदाना और आशियाना प्राप्त करने का अवसर मिला है। 
 
संसद में 62 सीटों का वर्चस्व वाली जिस स्विस पीपुल्स पार्टी; एसवीपी ने मीनारों पर रोक के लिए मतसंग्रह का आगाज किया था, उसके नेताओं ने तर्क दिया कि ये हमारे देश में बढ़ती मुस्लिम ताकत का प्रतीक हैं। ‘बेकर’ नाम से लोकप्रिय एसवीपी के नेता कहते हैं, ‘इन्हें नहीं रोका गया तो धीरे-धीरे स्विट्जरलैंड इस्लामी देश बन जाएगा।’
बकौल बेकर, ‘तुर्की के प्रधानमंत्री रिसेप तैयप एर्दोआन ने ठीक ही कहा था कि मीनारें बेनट हैं। हम तो इन्हें मिसाइलें मानते हैं।’ एसवीपी को इस पूरे मामले पर जिस तरह से समर्थन मिला है, उसका असर यूरोप के दूसरे देशों में दिखने लगा है। यह पार्टी विदेशी नागरिकों के बसने का विरोध करती रही है। एसवीपी में जर्मन भाषियों का बोल-बाला है। इस पार्टी ने नस्लवादी हमलों या टिप्पणियों के लिए दंड को समाप्त करने की अपील की है। स्विस समाज पर न्यायपालिका का वर्चस्व इस पार्टी को नहीं सुहाता।

देश के मुस्लिम संगठन इसे लेकर नाराज हैं। मिस्र मूल के मुफ्ती अली गोमा कहते हैं कि स्विस जनता को इस्लाम के बारे में और जानकारी देने की जरूरत है। जेनेवा स्थित इस्लामी कांफ्रेंस के प्रतिनिधि बाबाकर बा कहते हैं, ‘यहां इस्लामोफोबिया को जिस तरह से बढ़ाया गया, उससे सावधान रहना जरूरी है। यह वोट नहीं, बल्कि बुरे सवाल का बुरा जवाब है।’ नाराज लोग ये भी कह रहे हैं कि इस बिना पर मुस्लिम देश स्विट्जरलैंड की आर्थिक नाकेबंदी कर सकते हैं, और वहां के बैंक उद्योग को वीरान कर सकते हैं।

वैसे यूरोप के दूसरे इलाकों में स्विस मतसंग्रह की काली छाया पड़ने लगी हैं। ब्रिटेन, स्वीडेन, फ्रांस, इटली, आस्ट्रिया, ग्रीस, जर्मनी, स्लोवानिया, बेल्जियम वैसे प्रमुख देश हैं, जहां पर मीनारों वाली बड़ी मस्जिदें बनाने की परियोजनाएं चल रही हैं। इसके लिए तुर्की, पश्चिमी अफ्रीकी देश, ईरान और अरब देशों से आर्थिक मदद मिल रही है। तब्लीगी जमात जैसे संगठन के लोग भी सक्रिय हैं।

इसे सिक्के का दो पहलू ही कहें कि एक ओर यूरोप का रूढ़िवादी समाज मस्जिद निर्माण का जमकर विरोध कर रहा है, तो दूसरी ओर कुछेक यूरोपीय देशों की सरकारें मस्जिद बनाने के लिए आर्थिक मदद दे रही हैं। इनमें स्वीडेन और स्पेन का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है, जहां सरकारी खजाने से मस्जिद निर्माण के लिए थोड़े पैसे दिये गये। यूरोप में निजी मकानों से लेकर कार गैराजों तक में ऐसी हजारों मस्जिदें चल रही हैं, जिनकी मीनारें नहीं हैं। मीनारों को देखकर वहां का पढ़ा-लिखा समाज क्यों भड़क रहा है, इसका उत्तर हमें ढूंढना होगा!

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