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सुखोई जमीन पर

पिछले दिनों राजस्थान में हुई सुखोई लड़ाकू विमान की दुर्घटना में पायलट तो बच गए, लेकिन सुखोई विमानों की सुरक्षितता पर एक प्रश्नचिह्न् तो लग ही गया। वायुसेना ने तमाम सुखाई विमानों की उड़ानों पर जांच पूरी होने तक रोक लगा दी है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि जांच में गड़बड़ी ठीक से पकड़ में आ जाएगी और उसे दुरुस्त भी कर लिया जाएगा, इस खबर ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की सुखोई यात्रा की खबर के उत्साह को ठंडा कर दिया है, क्योंकि इस साल यह सुखोई की दूसरी दुर्घटना है।

इसी दौरान छह मिग विमान भी हादसों का शिकार हो चुके हैं। मिग विमानों की सुरक्षा का रिकार्ड तो और भी बुरा है, वायुसेना की ही दी हुई जानकारी के मुताबिक पिछले दो दशकों में 265 मिग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं यानी एक विमान प्रति माह के औसत से भी ज्यादा। जाहिर है इन दुर्घटनाओं में हुआ नुकसान कई हजार करोड़ रुपए का होगा, लेकिन इससे ज्यादा बुरा इन दुर्घटनाओं में पायलटों या दूसरे लोगों का मरना है।

जब वरिष्ठ वायुसेना अधिकारी यह तर्क देते हैं कि एक लड़ाकू पायलट के प्रशिक्षण प 10-15 करोड़ रुपया खर्च होता है। ऐसे में महिलाओं को लड़ाकू पायलट नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि वे शादी करेंगी, बच्चों की देखभाल करेंगी तो उनकी सेवाओं का पूरा लाभ नहीं लिया जा सकता। अगर यह तर्क माना जाए तो लगभग सौ प्रशिक्षित नौजवानों की दुर्घटनाओं में मौत को हम कैसे यूं ही टाल सकते हैं। अगर विमानों में कोई तकनीकी कमी है तो उसे दुरुस्त करने के लिए भी हमारे पास काफी वक्त था और अगर प्रशिक्षण में कोई कमी है तो वह भी अब तक ठीक हो जानी चाहिए थी। हर लड़ाकू विमान हमारी रक्षा तैयारियों का एक जरूरी पुर्जा है और अगर एक भी विमान बेकार है तो वह रक्षा तैयारियों में एक छेद बना देता है।

सौ से ज्यादा सुखोई विमानों को जमीन पर रख कर हम अपनी सुरक्षा तैयारियों को कमजोर कर रहे हैं। सेना के अधिकारी यह शिकायत करते हैं और यह दुरुस्त भी है कि राजनेता और अफसर सैन्य उपकरण खरीदने के काम में अड़ंगे लगाते हैं और रक्षा तैयारियों को वक्त से पीछे ढकेल देते हैं, लेकिन हमारे अत्याधुनिक विमानों में हो रही दुर्घटनाएं भी ऐसा सवाल है, जिसका साफ-साफ जवाब देश को मिलना चाहिए। अगर ऐसा न हुआ तो आशंकाएं और संदेह तो फैलेंगे ही।

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