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ट्राइटियम

ट्राइटियम हाइड्रोजन का रेडियोएक्टिव समस्थानिक है। इसे ट्राइटॉन भी कहा जाता है। ट्राइटियम के नाभिक में एक प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन होते हैं। वहीं हाइड्रोजन के सबसे प्रचुर मात्र में मौजूद समस्थानिक प्रोटियम में एक प्रोटॉन होता है और न्यूट्रॉन अनुपलब्ध होता है। इस समस्थानिक का नाम ग्रीक शब्द ‘थर्ड’ से मिलकर बना है।

ट्राइटियम की उत्पत्ति हैवी वाटर मॉडरेट रिएक्टर में डय़ूटीरियम में न्यूट्रान के टकराने से होती है। इस प्रक्रिया में थोड़ा सा ट्राइटियम बनता है। ट्राइटियम का आण्विक भार 3.0160492 होता है। स्टेंडर्ड तापमान और दबाव पर ट्राइटियम गैस है। ऑक्सीजन से मिश्रित होने पर यह ये लिक्विड का निर्माण करती है जिसमें ट्राइटिएटेड वाटर का निर्माण होता है। रबड़, प्लास्टिक और कुछ तरह के स्टील के लिए ये पारगम्य होता है। 

ट्राइटियम की खोज 1920 में वाल्टर रसेल ने की थी। वहीं विल्फर्ड एफ. लिबी ने यह खोज की थी कि ट्राइटियम का इस्तेमाल डेटिंग वाटर के तौर पर हो सकता है। हाइड्रोजन की तरह ट्राइटियम को सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक समूहों में अकसर ये बात उठती रहती है कि अगर ट्राइटियम को फ्यूजन रिएक्टरों में अधिक मात्र में इस्तेमाल किया जाए तो उससे रेडियोधर्मी प्रदूषण होता है। विभिन्न देशों में ट्राइटियम के इस्तेमाल पर पाबंदी है।

ट्राइटियम तकरीबन हाइड्रोजन से मिलती-जुलती होती है जिसकी वजह से यह आसानी से मिलकर कार्बनिक बंध बना लेते हैं। ट्राइटियम बीटा का मजबूत उत्सर्जक नहीं है जिस कारण यह काफी खतरनाक होता है। खाना, पानी और त्वचा द्वारा अवशोषण किए जाने के कारण सांस लेने या खाना खाने के दौरान काफी हानिकारक होता है।

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