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ब्लॉग वार्ता : पच्चीस साल बाद भोपाल

दो और तीन दिसंबर 1984 की दर्मयानी रात। साल और दिन रविवार। भोपाल के 25 हजार लोग मारे गए और पांच हजार से ज्यादा जिंदा लाश बन गए। एक पीढ़ी खत्म हो गई और 25 साल भी गुजर गए। भोपाल कैसे जीता रहा इस त्रासदी को। वे कैसे लड़ते रहे मुआवजों के लिए। लोग कैसे हड़पते चले गए मुआवजा। सबक क्या सीखा इस पर बहस होगी, लेकिन जिस पर जो गुजरी, उसका हिसाब कौन देगा? यही फैसला नहीं हो सका है। टैंक नंबर 610, जिससे गैस का रिसाव हुआ, पब्लिक देख सके इसलिए कारखाने का गेट खोल दिया गया है। हिंदी के ब्लॉगरों ने इस पूरी त्रासदी को नए सिरे से खड़ा कर दिया है। 

http://edharhai.blogspot.com क्लिक करते ही उस रात की दास्तान शुरू हो जाती है। सुबह के कोई आठ बजने वाले थे कि टैक नंबर 610 से मिथाईल साइनामाईट रिसने लगा। रात बारह बजे के बाद इसका खौफनाक मंजर पता चला तो कंपनी के लोग सक्रिय हुए, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। दिलीप लिखते हैं कि चारों तरफ लाश ही लाश थी, अंतिम संस्कार के लिए शमसान में भी जगह नहीं थी। हजारों लोग सोने के बाद कभी उठ नहीं पाए।

सरिता लिखती हैं कि हर साल भोपाल में सरकारी और गैरसरकारी तौर पर बड़े-बड़े आयोजन होते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सरकार की नाइंसाफी को जी भर कर लानतें भेजी जाती हैं। गैस कांड की बरसी पर यूनियन कार्बाइड, वरेन एंडरसन और अब डाउ केमिकल को जी भरकर कोसने का दस्तूर सा बन गया है। इस बार तो बरसों से वीरान पड़े कारखानें में चहल-पहल बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने बीस नवंबर से ही आम जनता के लिए खोलने का अजीबो गरीब फैसला लिया।

http://sareetha.blogspot.com क्लिक करते ही नुक्ताचीनी पर सरिता की तल्खियां सरकारी रवायतों को झकझोरने की नाकाम कोशिश करती नजर आती हैं। ब्लॉगर अपने स्तर पर भोपाल की इस बरसी पर सरकारी नीयत की पोल खोल रहे हैं। सरिता लिखती जा रही हैं कि गैस कांड के पीड़ित विभिन्न गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। कोई  कैंसर से, तो कोई अपंगता से। इनके इलाज के लिए जो चिकित्सकीय सुविधाएं हैं और जो डाक्टर उपलब्ध कराए गए हैं वे नाकाफी हैं।

http://paharikedhoom.blogspot.com क्लिक करते ही पहाड़ी की धूम ब्लॉग पर  लिमिट खरे का लेख परेशान करता है। बताते हैं कि उस समय टैंक नंबर 610 में पानी चले जाने के कारण हुई रासायनिक क्रिया के चलते टैंक का तापमान 200 डिग्री के  करीब पहुंच गया। चूंकि टैंक इतना अधिक तापमान सहने की स्थिति में नहीं था, लिहाजा रात दस बजे टैंक के बाल्व खोल दिए गए थे। नतीजा भोपाल की हवा में जहर मिल गया। रात एक बजे पुलिस ने मोर्चा संभाला, किन्तु यूनियन कार्बाइड ने गैस रिसाव से इंकार कर दिया गया। 25 बरस पहले तीन दिसंबर की रात दो बजे पहला मरीज दाखिल किया गया। इसके बाद दो बज कर दस मिनट पर खतरे का सायरन बज उठा।

ब्लॉगरों का गुस्सा सहज है। आखिर भोपाल गैस पीड़ितों को लेकर कितने फरेब हुए, वहां की जनता जानती है। लिमिट लिखते हैं कि सरकार ने गैस के दुष्प्रभाव पर अनेक शोध करवाए हैं, लेकिन नतीजा सिफर निकला। इन शोधों का खुलासा नहीं किया गया और तो और राजनीतिक दलों ने कभी इसे मुद्दा नहीं बनाया। क्या बीजेपी, क्या कांग्रेस सबके ताकतवर नेता अपने परिवार के पीड़ितों के लिए मुआवजे की मोटी रकम निकलवाने में कामयाब रहे लेकिन गरीब पीड़ितों की मदद के लिए अब्दुल जब्बार जैसे लोग ही करते रहे।
 
http://virendrakanak.blogspot.com पर यह कविता बार बार सिस्टम के नकारेपन की याद दिलाती है। कविता इस प्रकार शुरू होती है- इस ताल-तलैया की नगरी से एक दुखद हादसा गुजरा था। इस स्वर्ग सी सुंदर नगरी से एक गमों का काफिला गुजरा था॥ मच गई थी उथल पुथल, और मौत तांडव करती थी। जहर घुल गया था उस नगरी में, जिसे जन्नत सजदा करती थी। सांस घुटी थी आंखें थी बंद, वो वक्त मुश्किल का गुजरा था। न जाने कितने फरेब फिर किए जायेंगे।

भोपाल गैस की पच्चीसवीं बरसी किस मुंह से सरकारें मनायेंगी। अपनी किस कामयाबी को याद करेंगी। यही नहीं बता सकतीं कि गुनहगार कहां हैं और मुआवजा से किसका घर भरा है। वैसे भोपाल गैस त्रासदी की बात हो और उस दौर में हिंदी के पत्रकार राजकुमार केसवानी की शानदार रिपोर्टिंग की चर्चा न हो, ऐसा हो नहीं सकता। ब्लॉगरों की नजर से लगता है कि केसवानी टूट गए हैं। केसवानी की हर रिपोर्ट मौत की आहट सुन रही थी। सरकारें सो रही थीं। सरकारें आज भी सो रही हैं।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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