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जीवन-वीणा के तार

दशकों पहले कुन्दनलाल सहगल ने डी. एम मधोक का लिखा एक गीत गाया था-
जीवन बीन मधुर न बाजे, झूठे पड़ गए तार
पंचम छेड़ो, मध्यम बोले, षढ्ज बने गंधार।

जब-जब सुख हमसे मुख फेर लेते हैं, तब-तब जीवन की वीणा के तार झूठे पड़ जाते हैं। सारे सुर बेतरतीब हो जाते हैं। जीवन को सुर में कैसे लाया जाए? संगीतज्ञों का ही कहना है कि जो गायक जितना मन्दर सप्तक यानि नीचे स्वर में रियाज करता है, वह उतनी ही कुशलता से ‘तार सप्तक’(ऊंचे स्वर) तक पहुंच पाता है। सारे स्वर उसका कहना मानने लगते हैं। फिर झूठे नहीं पड़ते। ऐसे ही जिन्दगी में जब दुख घेर कर अतल गहराइयों तक धकेल देते हैं तब जो मनुष्य उनमें जीना सीख लेता है वही सुख की ऊंचाइयों को फिर से छू पाता है।

खुश रहना मनुष्य की संरचना में है। अनुवांशिक है। बड़े-बड़े हादसों के बाद भी धीरे-धीरे मनुष्य का अपने सहज भाव की ओर लौटना तय है। इसके बिना जिन्दा रहना मुश्किल है। कहा गया है कि खुशी एक रेडियो स्टेशन की तरह है। वह हमेशा प्रसारण करता रहता है। बस हमें जिन्दगी को ऐसे ‘टय़ून’ करना सीखना पड़ता है कि खुशी ‘फ्रीक्वेंसी’ को पकड़ सकें।

‘खुशी’ हमारी इच्छाओं की पूर्ति से जुड़ी रहती है। मगर होता यह है कि एक इच्छा पूरी होती है कि दूसरी के लिए प्राण अधरों तक आ जाते हैं। गालिब किस कदर अपने आप से आजिज आए होंगे कि लिखना पड़ा- ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले। बड़े निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले।’ इन अरमानों के पर कतरने की जरूरत है। यदि हम पूर्णकाम हो गए तो कर्म करने की, जीने की ललक ही न रहेगी।
आयरलैंड की एक शुभकामना है- ‘तुम्हारी सब शुभकामनाएं पूरी हों, सिर्फ एक छोड़कर- ताकि कुछ तो रहे जिसे पाने के लिए तुम कोशिश करते रहो।’

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