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खाद के लिए मारामारी और कालाबाजारी भी

यूरिया व अन्य उर्वरकों की तो जिले में कोई कमी नहीं है, किल्लत केवल फास्फेटिक फर्टिलाइजर की है। मुख्य रूप से डीएपी और एनपीके के लिए पिछले दो माह से मारामारी मची हुई है। इन उर्वरकों में मिलावट व कालाबाजारी भी हो रही है। डीएपी के साथ कई कम्पनियाँ पोटाश, बीज व कई अन्य तरह के सूक्ष्म पोषक तत्व भी दे रही हैं। इससे खुले बाजार में किसानों को डीएपी काफी महँगी पड़ रही है।

जिले में सरकारी खाद का वितरण 108 केन्द्रों पर किया जा रहा है। इसके अलावा निजी दुकानदारों द्वारा भी खाद  की बिक्री की जा रही है लेकिन निजी दुकानों पर डीएपी बहुत ही कम क्षेत्रों में उपलब्ध है। इसलिए सरकारी केन्द्रों पर भीड़ लग रही है। खाद का सबसे अधिक वितरण साधन सहकारी समितियों के माध्यम से किया जाता है। जिले में कुल 207 समितियाँ हैं लेकिन अधिकांश डिफाल्टर हो चुकी है। इसलिए केवल 85 समितियों से ही खाद का वितरण किया जा रहा है।

समितियों पर सबसे अधिक समस्या है। आलम यह है कि डीएपी के लिए किसान रात को भी समितियों पर डेरा डाले रहते हैं। इसके बाद भी डीएपी की कालाबाजारी जा रही है। शासन के निर्देश पर मारे गए छापों में कई निजी दुकानों से सरकारी डीएपी बरामद की गई। कौड़िहार और कोरांव क्षेत्र में कालाबजारी के लिए गोदामों में रखी गई एक हजार बोरी से अधिक खाद बरामद की जा चुकी हैं।

अवैध तरीके से खाद की बिक्री करने वाले बारह लोगों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई है। कई उर्वरक विक्रेताओं के लाइसेंस भी निरस्त किये जा चुके हैं। इसके बाद भी कालाबाजारी नहीं रूक रही है। फूलपुर तहसील के कई बिक्री केन्द्रों पर डीएपी के लिए बवाल भी हो चुका है। इसके बाद प्रशासन थोड़ा हरकत में आया तो झूँसी क्षेत्र में दो ट्रक डीएपी पकड़ी गई।

इन ट्रकों में लदी बोरियों से खाद निकालकर उसे दूसरे बोरियों में पैक किया जा रहा था। डीएपी की किल्ल्त के कारण तमाम क्षेत्रों में गेहूँ की बुआई नहीं हो पा रही है। इससे किसानों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। किसानों के आक्रोश को देखते हुए जिलाधिकारी संजय प्रसाद स्वयं केन्द्रों का औचक निरीक्षण कर रहे हैं। हालाँकि जिला कृषि अधिकारी गणेश प्रसाद दुबे का कहना है कि डीएपी की कोई कमी नहीं है। स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में हैं।

रबी फसलों की बुआई के लिए प्रशासन द्वारा पैंतीस हजार मीट्रिक टन डीएपी की डिमांड की गई थी। अभी तक चौबीस हजार मीट्रिक टन डीएपी व एनपीके उपलब्ध हो पाई है। कालाबाजारी के साथ ही निजी दुकानों पर डीएपी काफी महँगी बिक रही है। कई कम्पनियां डीएपी के साथ बीज, बायोपेस्टीसाइट व बायोफर्टिलाइजर भी दे रही है।

इस तरह एक बोरी डीएपी के साथ किसान को तीन सौ की अतिरिक्त खाद खरीदनी पड़ रही है। हालाँकि कम्पनियों द्वारा दिए जा रहे बायोफर्टिलाइजर भूमि के लिए काफी उपयोगी हैं लेकिन किसानों को यह सौदा काफी महंगा पड़ रहा है। किसानों का कहना है इससे सस्ता को ब्लैक में ही पड़ रहा है।

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