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28 फरवरी, 2020|8:57|IST

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पूछने वालों पर सवाल

संसद में सोमवार को जो कुछ हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रश्नकाल के दौरान सवाल पूछने वाले सांसदों का नदारद रहना लोकतंत्र का मखौल उड़ाना है। दो दशक में ऐसा पहली बार हुआ है, जब प्रश्न पूछने वाले सांसदों के मौजूद न रहने के कारण प्रश्नकाल को समय से पूर्व स्थगित करना पड़ा। संसद की कार्यवाही में प्रश्नकाल सबसे महत्वपूर्ण होता है। कुछ वर्ष पूर्व संसद में प्रश्न पूछने के लिए कुछ सांसदों द्वारा रिश्वत लेने का मामला सामने आया था।

अब सासंदों के इस  गैर जिम्मेदाराना रवैये से पता चलता है कि वे न तो जनता के प्रति और न ही देश के प्रति गंभीर हैं। सत्ता में आने के बाद उन्हें शायद यह याद नहीं रहता कि वे ‘जनता के सेवक’ हैं और जनता के प्रति उनकी जवाबदेही भी है। प्रश्नकाल के माध्यम से सांसदों को देश व अपने चुनाव क्षेत्र की समस्याओं को उठाने का मौका मिलता है। इससे यह भी पता चलता है कि अपने क्षेत्र और वहां की जनता की कितनी परवाह करते हैं। ऐसा भी नहीं है कि प्रश्न पूछने वाले सांसदों को पहले से जानकारी नहीं होती कि उन्हें किस दिन सवाल पूछना है। संबंधित सांसदों को सवाल सूचीबद्ध होने की जानकारी दो-तीन दिन पहले मिल जाती है, ताकि वे सदन में मौजूद रह सकें। इसके बावजूद सांसदों का अनुपस्थित रहना गंभीर मामला है।
  
पिछले कुछ समय से सदन में सांसदों की उपस्थिति लगातार कम होती दिख रही है। संसद की कार्यवाही का स्तर भी पहले जैसा नहीं रहा। अब गंभीर मुद्दों पर गरमा-गरम बहस भी कम ही देखने को मिलती है। संसद की कार्यवाही पर प्रति मिनट करीब 26 हजार रुपए खर्च होते हैं। एक घंटे के प्रश्नकाल पर 14 से 20 लाख रुपए तक खर्च होते हैं।

एक सवाल करीब एक लाख रुपए का पड़ता है और यह सीधे-सीधे जनता के गाढ़े पसीने की कमाई की बर्बादी है। संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है, जिसे टीवी पर सारा देश देखता है। ऐसे में ये सांसद देश के सामने क्या उदाहरण पेश कर रहे हैं, यह सोचने की बात है। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार सांसदों के इस आचरण से आहत हैं। 

पिछले लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी भी सांसदों के खराब आचरण पर कई बार सार्वजनिक रूप से नाराजगी जता चुके थे। पिछले सत्र में कांग्रेस सांसदों के समय पर और नियमित रूप से संसद नहीं पहुंचने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी उन्हें फटकार लगाई थी। इसके बावजूद प्राय: सभी दलों के सांसदों के आचरण में कोई सुधार नजर नहीं आया। सभी दलों के नेता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संसद की मर्यादा का पालन हो। 

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