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पाक को फटकार

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को आतंकवाद के बारे में जो कड़ी चिट्ठी लिखी है, उससे अपनी अफ-पाक विदेश नीति पर उनकी बेचैनी साफ जाहिर होती है। लेकिन उससे इस इलाके में स्थिरता लाने में भारत की भूमिका का महत्व भी दिखाई पड़ता है। ओबामा ने दौरे से लौटे भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को फोन कर अफगानिस्तान की स्थितियों पर जिस तरह चर्चा की है, उससे लगता है कि वे पाकिस्तान के छद्म के साथ भारत के पक्ष को भी समझ रहे हैं। 

अमेरिका ने पाकिस्तान से साफ कहा है कि ‘हंसब ठठाई फुलाइब गालू’ वाली नीति नहीं चलने वाली है। यानी आतंकवाद से युद्ध लड़ने और आतंकियों को पालते रहने की दोगली नीति को नजरंदाज कर पाना अब मुश्किल है। इससे भी खास बात यह है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान के जिन आतंकी संगठनों से संबंधों की तरफ संकेत किया है, उनमें अलकायदा, अफगान तालिबान, हक्कानी नेटवर्क के अलावा लश्करे-तैयबा का भी नाम है। इसका  मतलब है कि उसने मुंबई हमले के जिम्मेदार संगठन को सजा दिलाने की भारतीय बेचैनी को समझा है।

उनकी यह बात भी भारत के हित में जाती है कि पाकिस्तान इन संगठनों का इस्तेमाल विदेश नीति के हथियार के तौर पर न करे।  इसमें भारत के लगातार चल रहे राजनयिक अभियान के साथ प्रधानमंत्री के हाल के अमेरिका दौरे का भी असर हो सकता है। अब सवाल यह है कि ओबामा के इस फटकार वाले पत्र को धमकी माना जाए या नई रणनीति की तैयारी? हालांकि ओबामा का यह पत्र सीधी बात कहने वाला है और उसके साथ उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेम्स एल जोन्स ने यह भी संदेश दिया है कि अगर पाकिस्तान इन आतंकवादी समूहों को खत्म नहीं कर सकता तो अमेरिका उनके पाकिस्तानी अड्डों को खत्म करने के लिए किसी भी तरह के साधन का इस्तेमाल कर सकता है।

लेकिन पत्र में भेजी गई इस फटकार के साथ पुचकार भी है, जिसमें कहा गया है कि अगर पाकिस्तान आतंकी संगठनों को खत्म करता है तो उसके भारत के साथ अच्छे रिश्ते बनवाए जाएंगे और अमेरिका उसे बड़े पैमाने पर व्यापारिक और आर्थिक मदद देगा। अमेरिका की तरफ से दी गई यह लालच ही उसकी धमकी के असर को कम करती दिखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यावहारिक तौर पर अमेरिका पाकिस्तान के प्रति ज्यादा सख्त हो भी नहीं सकता।

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  • Web Title:पाक को फटकार