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अब तो कार्रवाई करे सरकार

पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी के सामंतो के खिलाफ शुरू हुआ जन आंदोलन आज अपना स्वरूप बदल चुका है। अब यह एक रोग का रूप ले चुका है। यह रोग भारत के 20 राज्यों के 223 जिलों तक पहुंच चुका है। सरकार कहती है कि अब नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई करेगी। अब बहुत हो चुका आश्वासन, सरकार को कुछ कार्रवाई भी करनी होगी।
निलाम्बुज तिवारी, नजफगढ़, दिल्ली

दिलासा देने का औजार
लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट भी आ गई। रिजल्ट भी शायद यही होना था, जैसा हुआ। आखिर क्यों बनाए जाते हैं ये आयोग, जब यही हश्र होना है। कहीं ये पुराने जजों को रोजी, राजनीतिकों को एक मुद्दा और जनता को झूठा दिलासा देने का औजार तो नहीं बने हैं।
गौरव सक्सेना, गांधी विहार, दिल्ली

फर्जी कर्मचारी वेतन स्कीम!
एमसीडी में यह स्कीम कब आई पता ही नहीं चला, लेकिन स्कीम के तहत 22,853 फर्जी कर्मचारी काम कर रहें थे,और हर महीने 17 करोड़ रुपए वेतन ले रहें थे। यह स्कीम वर्षो पुरानी है, लेकिन जांच में लगाई गई बायोमेट्रिक टीम ने इस घोटाले को पकड़ लिया। अब सोचने वाली बात यह है कि हर महीने भारी भरकम वेतन जाता किसकी जेब में होगा? दिल्ली वासियों को धन्यवाद कहना चाहिए बायोमेट्रिक सिस्टम को जिसकी मदद से सलाना 204 करोड़ रुपए का बड़ा घोटाला सामने आया।
रोबिन रस्तोगी, नई दिल्ली 

आयोगों का हश्र
लिब्रहान आयोग पर बोलने, लिखने वाले और राजनीति करने वाले क्या इस से पहले के आयोगों को भूल गए? जिस भी रिपोर्ट में किसी नेता का नाम आ गया उस पर कार्रवाई नहीं हो सकी। क्योंकि चोर-चोर और कमिशन-कमिशन सब गोलमोल होते हैं।
नवाब खान, फरीदाबाद

ऐसा तिरस्कार क्यों?
एक नेता को हिंदी में शपथ लेने के कारण विधानसभा में मारपीट कर अपमानित किया जाता है, इतना ही नहीं महानतम खिलाड़ी ‘सचिन तेंदुलकर’ को सिर्फ इतना कहने पर अपमानित किया जाता है की वे भारतीय हैं और उन्हें इसका गर्व है। आज जब आवश्यकता है संयुक्त रूप से एकत्र होकर आतंकवाद, गरीबी, बेरोजगारी तथा मंदी जैसी प्रमुख समस्याओं को सुलझाने की, उस वक्त हम आपस में उलझकर देश की ‘एकता’ और ’अखंडता’ को ठेस पहुंचा रहे हैं।
पंकज डोगरा, दिल्ली विश्वविद्यालय

पहले से सावधान रहें
ठंड बढ़ने के साथ-साथ स्वाइन फ्लू फिर से अपने पांव पसारता दिख रहा है। बीमार बच्चों के स्कूल को एक हफ्ते के लिए बंद करवाना, फागिंग करवाना, छात्रों में फ्लू की गोलियां बंटवाना तो ठीक है लेकिन पहले से ही विद्यालय, बस, ट्रेन जैसी जगहों में सावधानी क्यों नहीं दिखाई जाती?
अनुराग वर्मा, गाजियाबाद

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