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प्रोबायोटिक फूड फायदेमंद पर दवा नहीं

देश के खाद्यान्न बाजार में प्रोबायोटिक्स फूड दस्तक दे चुके हैं। देसी-विदेशी कंपनियां इन्हें लेकर बाजार में उतर चुकी हैं। लेकिन इन्हें लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई कि ये फूड हैं या दवा। कुछ कंपनियां इन्हें स्वस्थ रहने के लिए कारगर बता रही हैं तो कुछ का दावा है कि ये बीपी, कोलेस्ट्रॉल समेत कोलोन कैंसर जैसी कई बीमारियों को भगाने में सफल साबित हुए हैं। इसलिए इनकी उपयोगिता को लेकर लोगों में जिज्ञासा बढ़ रही हैं। 

प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थ का प्रचलन विकसित देशों में खूब है तथा वहां इनके प्रभावों को लेकर काफी शोध भी हुए हैं जो यह साबित करते हैं कि ये कुछ बीमारियों से बचाव में फायदेमंद हो सकते हैं। लेकिन उपचार में इनकी भूमिका की पुष्टि कहीं नहीं हुई है। इसलिए भारतीय चिकित्साविदों का कहना है कि प्रोबायोटिक फूड को न तो दवा के रूप में लेना चाहिए और न ही कंपनियों को इनके बारे में ऐसा प्रचार कर दावे करने चाहिए।

क्या है प्रोबायोटिक फूड ?
प्रोबायोटिक फूड वह खाद्य पदार्थ हैं जिसमें जिंदा बैक्टीरिया या माइक्रोआर्गेनिज्म शामिल होते हैं। प्रोबायोटिक विधि रूसी वैज्ञानिक एली मैस्निकोफ ने 20वीं सदी में प्रस्तुत की थी। उन्हें बाद में नोबेल पुरस्कार भी मिला था। इस विधि के अनुसार शरीर में दो तरह के बैक्टरिया होते हैं, एक मित्र और एक शत्रु। भोजन के जरिए यदि मित्र बैक्टीरिया लें तो वे धीरे-धीरे शरीर में मौजूद शत्रु बैक्टीरिया को नष्ट करने में कारगर साबित होते हैं। मित्र बैक्टीरिया प्राकृतिक स्रोतों और भोजन से प्राप्त होते हैं। मसलन दूध, दही और कुछ पौंधों से मिलते हैं। अभी तक तीन-चार ऐसे बैक्टीरिया ज्ञात हैं जिनका इस्तेमाल होता है। इनमें लेक्टिक एसिड, बिफीडो, यीस्टस, बेसिल्ली। इन्हें एकत्र करके प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थ में डाला जाता है। दावा है कि इस तरह से शरीर में पहुंचने वाले बैक्टीरिया किसी प्रकार का नुकसान भी नहीं पहुंचाते हैं। शोधों में बीमारियों की रोकथाम में इनकी भूमिका सकारात्मक पाई गई है तथा इनके कोई साइड इफेक्ट ज्ञात नहीं हैं।

किन बीमारियों में फायदेमंद?
डिपार्टमेंट ऑफ हैल्थ रिसर्च के एडवाइजर डॉ. एन. के. गांगुली ने बताया कि भारत में प्रायोबायोटिक फूड के नफे-नुकसान को लेकर कोई शोध नहीं हुआ है, लेकिन विदेशों में काफी शोध हुए हैं। वह शोध बताते हैं कि प्रोबायोटिक फूड डायरिया, मधुमेह, लोअर रेस्पेरेटरी इंफेक्शन, मोटापा घटाने, इरीटेबल बाउल सिंड्रोम से बचाव में कारगर हैं। इनका नियमित सेवन बीपी, कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से भी रोकता है। डायरिया संक्रमण में इनका प्रयोग उपचार की भी भूमिका निभाता है। डॉ. गांगुली के अनुसार ये नतीजे विदेशों में हुए अध्ययनों के आधार पर हैं लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि भारतीय लोगों पर भी इनका वही प्रभाव होगा। इसलिए इनकी बिक्री से पहले इनके भारतीयों पर भी परीक्षण होने चाहिए।

आईसीएमआर बनाएगी गाइडलाइंस
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने प्रोबायोटिक फूड बाजार को लेकर आशंकित है कि इन्हें लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां भ्रम फैला सकती हैं। इसलिए प्रोबायोटिक फूड को रेगुलेट करने के लिए गाइडलाइंस तैयार की गई हैं जिन्हें अगले साल जनवरी से लागू किया जाएगा। गाइडलाइन नेशनल फूड सेफ्टी एक्ट के तहत तैयार की गई हैं। 

इसमें प्रमुख प्रावधान यह है कि कोई भी प्रोबायोटिक कंपनी यह क्लेम नहीं कर पाएगी कि फलां प्रोबायोटिक खाने से फलां बीमारी का मर्ज दूर हो जाता है। यदि कोई कंपनी ऐसा दावा करेगी तो उसे अपने उत्पादों को क्लिनिकल ट्रायल के लिए पंजीकृत कराना होगा और दवाओं की तरह उनके ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल होंगे तथा उसके नतीजे यदि कंपनी के पक्ष में हुए तो ही वह इस बात का प्रचार कर पाएगी। फिर ऐसे प्रोडक्ट को फूड नहीं प्रोबायोटिक दवा का दर्जा दिया जाएगा। वर्ना उसे अपनी बिक्री बंद करनी होगी। 

इन कड़े प्रावधानों का कंपनियां अभी से विरोध करने लगी हैं। दरअसल, प्रोबायोटिक खाद्यान्नों की बिक्री को लेकर सरकार की असल चिंता इस बात को लेकर है कि इनसे बीमारियों के उपचार का दावा किया जा सकता है। हां, कंपनियों को इन्हें हैल्थ फूड प्रचारित कर बेचने की छूट होगी।

प्रोबायोटिक फूड बाजार 14 अरब डॉलर का
विश्व में प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थ का कारोबार 14 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। भारत में मदर डेयरी, याकुल्ट समेत कई कंपनियां प्रोबायोटिक दूध और दही उतार चुकी हैं। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस कारोबार में कूदने की फिराक में हैं। दूसरे, कई देशों में स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं होने के कारण प्रोबायोटिक उत्पाद बेचने वाली कंपनियां इनसे किडनी से लेकर कैंसर तक के उपचार दावा कर रही हैं जबकि इसका कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है। फिर भी लाइलाज बीमारियों के उपचार से वंचित लोग बड़ी उम्मीद के साथ इनका सेवन करते हैं।

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