class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

क्रिस्टालेंस लगवाएं, चश्मे से आजादी पाएं

आंखों के इलाज में विश्वस्तरीय नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल करने में सेंटर फॉर साइट मीलों आगे है। मोतियाबिन्द के इलाज के लिए यहां नवीनतम तकनीक क्रिस्टालेंस का यहां इस्तेमाल शुरू हो गया है। यह एफडीए अनुमोदित एकोमोडेटिंग लैंस है। इस लैंस के लगने के बाद मरीज को निकट की चीजों के लिए भी चश्मा लगाने की जरूरत नहीं होती और वह दूर, पास व दरमियानी नजर के सारे महीन काम आसानी से कर सकता है। इस लैंस का इस्तेमाल फिलहाल देश में सिर्फ 12 सेंटरों में किया जा रहा है। दिल्ली में 3 ऐसे सेंटर हैं, जहां इसका इस्तेमाल शुरू किया गया है। सेंटर में बीते दो सप्ताह में 15 लोगों को ये लैंस लगाए गए हैं।

इलाज की तमाम सुविधाएं
सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित सेंटर के मेडिकल डायरेक्टर डा. महिपाल एस. सचदेव के मुताबिक सेंटर में आंखों के स्वास्थ्य संबंधी लगभग तमाम नवीनतम सुविधाएं मौजूद है। इनमें माइक्रो इंसिजन कैटरैक्ट सजर्री (1.8 मिलीमीटर), ग्लैकोमा सर्विसेस, विट्रो रेटिनल सर्विसेस, यूविया, कॉर्नियल सर्विस, स्क्विंट, पीडियाट्रिक ऑप्थेमोलॉजी, न्यूरो ऑप्थेमोलॉजी, ओक्यूलोप्लास्टी एंड टय़ूमर, ऑप्टिकल एंड लो विजन एड्स, कॉन्टैक्ट लेंस, कॉम्प्रेहेंसिव आई चैकअप आदि शामिल हैं। 

इस सेंटर में 25 नेत्र विशेषज्ञों (ऑप्थेमोलॉजिस्ट) का पैनल है। इन तमाम विशेषज्ञों का प्रशिक्षण एम्स के आर.पी. सेंटर, अरविन्द आई केयर सेंटर, शंकर नेत्रलय, एलवी प्रसाद आई इंस्टीटय़ूट, गुरु नानक आई सेंटर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हुआ है। सेंटर में न केवल देश भर के मरीजों का बेहतर इलाज किया जाता है बल्कि काफी संख्या में विदेशी मरीज आंखों के इलाज के लिए यहां आते हैं।

हाल ही में कनाडा से आईं कैरोलीन ऐंडरसन की दोनों आंखों में नवीनतम लेंस क्रिस्टालेंस सफलतापूर्वक लगाए गए। लेसिक सजर्री शुरू करने में सेंटर पायनियर रहा है। इंट्रालेस-फेमटो सकेण्ड लेजर तकनीक की शुरुआत न केवल भारत बल्कि दक्षिण एशिया में पहली बार इसी सेंटर में हुई। इसी तकनीक का इस्तेमाल नासा व यूएस एयरफोर्स द्वारा एरोनॉट व फायटर पायलट के रेफ्रेक्टिव एरर दूर करने के लिए किया जाता है। 

असली जैसी कृत्रिम आंख
विशेषज्ञ डाक्टरों की टीम ने कृत्रिम आंख लगाने की यह एक ऐसी विधा विकसित की है जिसमें कृत्रिम आंख एकदम असली जैसी दिखाई देगी। कई मरीजों की एक आंख की कॉर्निया दुघर्टना आदि में इस कदर क्षतिग्रस्त हो जाती है कि उसमें नेत्र प्रत्यारोपण भी नहीं हो सकता। ऐसी आंखों में दूसरी आंख जैसी हू-ब-हू कृत्रिम नेत्र लगाया जाता है। इससे व्यक्ति एक आंख नहीं होने का सदमा कुछ हद तक भूल सकता है। इस विधि में न तो सजर्री की जाती है और न ही मरीजों को महीना-डेढ़ महीना रिकवरी पीरियड में रहना पड़ता है। सेंटर के ओकुलो प्लास्टिक सजर्न डॉ. विकास मेनन ने बताया कि जटिल सॉकेट सजर्री के विकल्प के रूप में यह प्रणाली उन मरीजों के लिए लाभप्रद है जो व्यस्त जीवन के चलते रिकवरी पीरियड में अधिक दिनों तक रहने की स्थिति में नहीं है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:क्रिस्टालेंस लगवाएं, चश्मे से आजादी पाएं