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मसूरी में है 18 पाउंड का गोला

देहरादून में अंग्रेजों व गोरखाओं के बीच ऐतिहासिक युद्ध की कुछ निशानियां आज भी सुरक्षित हैं। अंग्रेजों ने पहली बार इस युद्ध में 18 पाउंड के गोले का इस्तेमाल किया था। यह गोला आज भी मसूरी में मौजूद है। आठवीं आयरिश ड्रेगून रेजीमेंट के जनरल डेविड ऑक्टोलॉनी ने 31 अक्टूबर 1814 को गिलेस्पी को इस युद्ध का नेतृत्व करने देहरादून भेजा था।

मेजर जनरल राबर्ट रोलो गिलेस्पी ने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए कैरेबियन द्वीप समूह, इंडोनेशिया व भारत के वेल्लोर में टीपू सुल्तान से युद्ध लड़ा था। गोरखाओं को अपने से कम आंकने की कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। गोरखाओं ने युद्ध शुरू होने के पहले ही दिन गिलेस्पी व उसके एडीसी समेत 27 नॉन कमीशन अधिकारी, 239 सिपाहियों को मार डाला था।

गिलेस्पी की कब्र मेरठ के सेंट जॉन्स चर्च में है। अंग्रेजों ने कलंगा (खलंगा) के युद्ध में गोरखाओं के किले को फतह करने के लिए 6 व 12 पाउंड कैनन तोप गोलों का इस्तेमाल किया। फिर भी वे किले को नहीं फतह नहीं कर पाए। 195 वर्ष पहले लड़ी गई यह लड़ाई एक माह तक चली।

एक बार मुंह की खाने के बाद 24 नवंबर को पुन: अंग्रेजों ने अपनी फौजों को एकत्र किया। कर्नल मोउली ने अंग्रेज सेना की कमान संभाली। गोरखाओं की रसद सप्लाई लाइन बंद कर दी। इस बार वह किले की दीवार तोड़ने के लिए 18 पाउंड कैनन बॉल तोप लाए। 18 पाउंड का तोप गोला आज भी मसूरी निवासी इतिहासकार गोपाल भारद्वाज के पास सुरक्षित है। उनके अनुसार अंग्रेजों व गोरखाओं के  बीच वर्चस्व की इस लड़ाई के बाद गढ़वाल का इतिहास ही बदल गया

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