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लोकदु:ख निवारण को बनें वेदांत सूत्र’

लोकदु:ख निवारण की कामना से ही महर्षि वेदव्यास ने वेदांत सूत्रों की रचना की। मनुष्य को अयथार्थ ज्ञान से मुक्त कर उसे यथार्थ ज्ञान का अनुभव कराना ही वेदांत सूत्रों की रचना का मुख्य उद्देश्य है। संसार में जो उत्पन्न होता है, उसका विनाश भी सुनिश्चित है। जिसकी उत्पत्ति नहीं उसका विनाश संभव नहीं।

उक्त विचार प्रख्यात विद्वान प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी ने व्यक्त किए। प्रो. त्रिपाठी व्यास महोत्सव के तहत बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में मंगलवार को वेदांत सूत्र पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि थे। प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि जिस ब्रम्ह में इच्छा, ज्ञान, क्रिया आदि का अभाव हो, उससे जगत की उत्पत्ति संभव नहीं है।

अत: बहुत से आचार्यो ने अद्वैत के साथ-साथ द्वैत, विशिष्टद्वैत आदि के भी सुंदर समन्वय का प्रयत्न किया। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के निदेशक डा. विजय कुमार त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत के बिना भारतीय संस्कृति की रक्षा संभव नहीं है। दिल्ली संस्कृत अकादमी के अध्यक्ष डा. श्रीकृष्ण सेमवाल ने कहा कि विश्व में आज जो भी विज्ञान है वह संस्कृत में छिपा है।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता संकाय प्रमुख प्रो. आरसी पण्डा ने की। स्वागत संयोजक डा. कमलेश झा व संचालन डा. धनंजय पाण्डेय ने किया। संगोष्ठी की शुरुआत डा. पतंजलि मिश्र के वैदिक मंगलाचरण से हुई। शोध पत्र प्रस्तुत करने वालों में डा. हरि प्रसाद अधिकारी, डा. उमारानी त्रिपाठी, प्रो. राम किशोर त्रिपाठी, डा. जयशंकर लाल त्रिपाठी आदि थे। 

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