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दो टूक (01 दिसंबर, 2009)

घटना छोटी है पर अंदेशा बड़ा! घटना यह है कि डीटीसी की एक लो फ्लोर बस में सोमवार को आग लग गई। अंदेशा यह है कि मेट्रो की तरह बसों की छवि पर भी सवालिया निशान न लगने लगें! राजधानी में वर्ल्ड क्लास मेट्रो चले, यह अच्छी बात है। लंदन-पेरिस की मॉडर्न बसें पहाड़ गंज-करोल बाग में दौड़ें, यह भी गौरव की बात है। 

लेकिन कोई यह न कह दे कि विदेशों से कोच और बस तो इंपोर्ट कर सकते हो, वहां जैसा वर्क कल्चर कहां से लाओगे! ऐसे हादसे हमारे वर्क कल्चर और हमारी मेंटेनेंस की काबिलियत पर उंगली उठाते हैं। संदेश यह जाता है कि ये मॉडर्न चीजें यहां वक्त से पहले आ गईं। या हम उनके लायक नहीं। थमती मेट्रो या जलती बसों का बस यही सबसे बड़ा खतरा है!

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