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तेंदुलकर की टीम

क्रिकेट में अलग-अलग वक्त की टीमों और खिलाड़ियों की तुलना करने का एक शगल चलता रहता है। अक्सर ऐसी बहसों या चर्चाओं का अंत किसी समझदार व्यक्ित के इस बयान से होता है कि अलग-अलग वक्त की टीमों या खिलाड़ियों की तुलना नहीं हो सकती। लेकिन अगर ऐसी तुलना सचिन तेंदुलकर करें तो इसका अलग अर्थ होता है। सचिन का कहना है कि वे जितनी भारतीय टीमों के सदस्य रहे हैं, उनमें से मौजूदा भारतीय टीम सबसे मजबूत टीम है। यह बात सचिन ने क्राइस्ट चर्च एक दिवसीय मैच के बाद कही, जिसमें उन्होंने 163 रन बनाए और भारत ने 50 ओवर में चार विकेट पर 3रन बनाए। भारत ने ये रन तब बनाए जब उसके दो आक्रामक बल्लेबाज वीरन्द्र सहवाग और गौतम गंभीर सस्ते में आउट हो गए। यह तथ्य सचिन की बात को प्रमाणित करता है कि इस टीम की बैटिंग में इतना दम है कि कोई भी स्कोर असंभव नहीं लगता। हो सकता है कि कई लोग सचिन की बात से सहमत न हों और उन्हें राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली वाली टीम ज्यादा मजबूत लगी हो, खासकर वह टीम जो 2003 के विश्व कप फाइनल तक पहुंची थी। आंकड़ों का विश्लेषण करने पर शायद और कोई टीम भी ज्यादा मजबूत दिख सके, लेकिन एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जीतने से ज्यादा किसी टीम का प्रभाव इस बात से दिखता है कि वह खेलती किस अंदाज से है। आस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीा की विश्व विजेता टीमों की धाक इसलिए नहीं थी कि वे कभी हारती नहीं थीं, बल्कि इसलिए थी कि वे हमेशा ऐसे खेलती थीं जसे हारना कोई विकल्प ही न हो। यही खूबी महेन्द्र सिंह धोनी की टीम की है कि एक दिवसीय क्रिकेट में कभी वह रक्षात्मक नहीं होती क्योंकि उसमें आठवें-नवें नंबर तक ऐसे खिलाड़ी हैं जो दो-चार ओवरों की बल्लेबाजी में मैच का रुख बदल सकते हैं। इस टीम के खेलने का अंदाज ऐसा है जो इसे श्रेष्ठ टीम बनाता है। यह ऐसी टीम है जिसमें सचिन तेंदुलकर हैं, लेकिन रन बनाने के लिए वह सचिन पर ही निर्भर नहीं हैं। जाहिर है सचिन का वक्तव्य एक दिवसीय क्रिकेट की बल्लेबाजी के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए, लेकिन यह भी मानना चाहिए कि यह ऐसी टीम है जिसकी रणनीति में हार का विचार ही नहीं होता और यही असली विजेता का लक्षण है।

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