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‘रसूखवालों को पैरोल’

दिल्ली हाईकोर्ट ने सजायाफ्ता कैदियों को पैरोल पर रिहा करने के मामले में दिल्ली सरकार की जमकर खिंचाई की है। कोर्ट ने मनु शर्मा को पैरोल पर रिहा करने के का हवाला देते हुए कहा कि रसूखवाले कैदियों को तो आसानी से पैरोल मिल रही है जबकि जरूरतमंद इस सुविधा से वंचित हैं। 

न्यायाधीश कैलाश गंभीर ने सीपी शूटआउट मामले में सजायाफ्ता सुमेर सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि पैरोल के मामलों में दिल्ली सरकार ‘ऊंची पहुंच’ वालों को तरजीह देते हुए भेदभाव पूर्ण रवैया अपना रही है। अदालत के आदेश पर गृह सचिव द्वारा इस साल के पैरोल आवेदनों के  बारे में पेश की गई रिपोर्ट पर जस्टिस गंभीर ने सख्त नाराजगी जताते हुए यह बात कही।

उन्होंने कहा कि सरकार सामान्य मामलों के निपटारे में तीन से छह महीने का समय लेती है जबकि मनु शर्मा के  आवेदन पर 20 दिन के भीतर फैसला हो गया। इस रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि गृह मंत्रलय रसूख वाले अपराधियों के आवेदन को प्राथमिकता दे रहा है। सरकार इन मामलों में किसी के साथ पक्षपात नहीं कर सकती। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ पैरोल आवेदनों के निस्तारण की समयसीमा के मामले पर स्वत:संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही है। खंडपीठ इस मामले में सरकार द्वारा पेश जवाब के आधार पर 25 नवंबर को दिशा निर्देश जारी कर सकती है। 

दिल्ली पुलिस की वकील मीरा भाटिया ने सुमेर सिंह को एक महीने की पैरोल देने की अदालत को जानकारी देते हुए बताया कि इस साल अब तक 72 लोगों को पैरोल दे दिया गया है। अदालत ने सरकार से सभी 98 आवेदनों को 15 से 30 दिन के भीतर निपटाने का आदेश दिया। इसके लिए गृह मंत्रलय सभी आवेदनों की विस्तृत जानकारी तीन दिन के अंदर पुलिस को देगा और पुलिस आयुक्त दस दिन के अंदर इनके बारे में सभी जरूरी जानकारियां एकत्र करेंगे। अदालत ने पुलिस आयुक्त और सरकार के प्रमुख सचिव को इस आदेश के पालन की विस्तृत जानकारी 21 दिसंबर तक पेश करने को कहा।

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