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पीएसयू में कैसे करें निवेश

सामान्यत: लोगों के मन में पीएसयू के आईपीओ/एफपीओ में निवेश को लेकर कई तरह के संशय रहते हैं। मसलन, इनमें निवेश कितनी अवधि के लिए करना चाहिए? क्या इनके आईपीओ में निवेश करने के लिए फिक्स्ड प्राइस रूट को अपनाना जरूरी है। वहीं हाल में एनएचपीसी और ऑयल इंडिया के आईपीओ के बेहतर प्रदर्शन न कर पाने के कारण सवाल गहराते जा रहे हैं। आने वाले समय में इसकी संभावनाएं क्या होंगी, यह प्रश्न सबके समक्ष है? आज हम बता रहे हैं पीएसयू के आईपीओ और एफपीअ में निवेश के कुछ सूत्र।

एनएचपीसी आईपीओ के सूचीबद्ध होने के बाद के प्रदर्शन ने बाजार और सरकार को बेचैनी में डाल दिया। सूचीबद्ध होने की तारीख के समय जो लोग अनुमान लगा रहे थे कि उन्हें फायदा होगा, उन्होंने अपना पैसा खोया। इस कंपनी की दीर्घकालिक संभावनाओं को देखते हुए निवेशकों के लिए ये ध्यान देने की बात हो सकती है पर सरकार को इस मामले में अनावश्यक रूप से चिंतित नहीं होना चाहिए। आईपीओ को 24 गुना ज्यादा पर बेचा जाना इस हकीकत को बयां करता है कि बाजार में इसकी कीमतों के प्रति रुझान था। और हां, जहां तक अंडर-प्राइसिंग की बात है तो पूरी तौर पर सरकार ही इसके लिए जिम्मेदार है। यहां पर आरईसी का उदाहरण देना वाजिब रहेगा। कंपनी ने 12 मार्च, 2008 को सूचीबद्ध होने पर थोड़े से प्रीमियम के साथ 105 रुपए का ऑफर दिया था और अगले तीन महीनों तक कंपनी ने इस स्टॉक को ऑफर प्राइस से थोड़ा सा ज्यादा पर ही ऑफर किया। हालांकि, बाद में ये लगातार गिरता गया और कम होकर 55 रुपए पर पहुंच गया जो करीब ऑफर प्राइस की आधी कीमत थी और अगले दस महीनों (2 जून, 2008 से 17 अप्रैल, 2009) तक इस स्टॉक की कीमत ऑफर प्राइस से कम रही। हालांकि, स्टॉक ने बेहतर प्रदर्शन किया और इसकी मौजूदा कीमत 217 रुपए है और ऑफर प्राइस से 107 प्रतिशत ज्यादा रिटर्न मिल रहा है।
जब ऑयल इंडिया का आईपीओ बाजार में आया तो बाजार के कई विशेषज्ञों ने इसकी ब्रांडिंग ओवरप्राइस्ड आईपीओ के रूप में की थी। दूसरी बार फिर, आईपीओ का सबस्क्रिप्शन 31 गुना रहा और सूचीबद्ध हुआ और लगातार प्रीमियम पर ही बिकता रहा। यह दर्शाता है कि बाजार ये मानता है कि वास्तव में कीमतें अंडरप्राइस्ड हैं। ऐसा लगता है कि कई निहित स्वार्थो के लिए इतना दबाव सहा जा रहा है या फिर कुछ लोग चाहते हैं कि सरकार भविष्य के पीएसयू आईपीओ की कीमत को पर्याप्त अंडरप्राइस रखे या वह बेहतर क्वालिटी के फ्लोटिंग स्टॉक नहीं चाहते ताकि वह मौजूदा स्टॉक बाजार की उथल-पुथल को बनाए रखें।
क्या आप ऐसा सोचते हैं कि कीमतें इन आईपीओ की सफलता का प्रमुख कारण था?  क्या आप सोचते हैं कि ऐसा संभव है कि छोटे निवेशकों के लिए एफपीओ/आईपीओ को डिस्काउंट पर दिया जाए? या फिर राजकोषीय घाटे को देखते हुए दोनों दिशाओं में तेजी से काम करें।
हमेशा की तरह सरकार के पास ये सबसे बेहतर मौका है कि वह तेजी से ऐसे लोगों को अलग करे। सरकार ने लंबे समय तक यह इंतजार किया कि एनएचपीसी और ऑयल इंडिया का आईपीओ बाजार की स्थिति के अनुरूप पहुंचे ताकि उसकी वैल्यूशन में सुधार होने के साथ-साथ बेहतर हो सके। प्राइवेट प्रमोटर लालची हो सकते हैं पर सरकार नहीं। यदि वह फायदा कमाना चाह रहे हैं तो उन्हें मानना होगा कि असली और स्थाई लाभ उन्हें देर से प्राप्त होगा। उदाहरण के तौर पर पिछले पांच सालों में चार पीएसयू के आईपीओ (एनटीपीसी, पीजीसी और आरईसी) के आईपीओ को देखें। गौर करने वाली बात है कि बाजार के शीर्ष पर बड़ी गिरावट होने के बावजूद सरकारी होल्डिंग की वैल्यू बाजार के सौजन्य से तीन गुनी हो गई। जहां जारी होने की तारीख के दौरान यह 80,791 थी, वहीं अब (10 नवंबर, 2009)  ये तीन गुनी यानी 2,32,624 करोड़ रुपए हो गई। इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार ने मुनाफा कमाया बल्कि इस आईपीओ के निवेशकों ने भी उतना ही फायदा कमाया। सरकार बाद के आईपीओ को बाजार में फैलाने के लिए बाजार की बेहतर स्थिति होने के बारे में कह रही है। ऐसे में न तो पहले घबराने की बात थी और न अब है। बार-बार वह प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात कहकर अपने इरादे जता रही है।
जहां तक आईपीओ की बात है तो रिटेल निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ऑफर प्राइस वाजिब होने चाहिए और क्यूआईबी कीमतों पर डिस्काउंट मिलना चाहिए। यह पक्की बात है कि इससे सरकार का रिटर्न नहीं बढ़ेगा। घरेलू स्नोतों का इस्तेमाल कर पब्लिक एंटरप्राइज द्वारा बनाई जाने वाली राशि को पब्लिक के साथ सही तरीके से बांटा जाना चाहिए। किसी भी मामले में ऊपर लिस्टिंग के बाद दर्शाई गई ट्र प्राइस डिस्कवरी से सरकार को आईपीओ में कम कीमतों में हुए नुकसान के बनिस्पत, भारी मुनाफा हो सकता है। सिवाय पोस्ट लिस्टिंग दबाव के लिए पीएसयू हमेशा निवेशकों की धन्यवाद लिस्ट में होंगे। आईपीओ और एफपीओ दोनों को रिटेल में फिक्स्ड प्राइस रूट को ही अपनाना चाहिए क्योंकि बुक बिल्डिंग के लिए यह गैर-जरूरी है।
ऐतिहासिक तौर पर आईपीओ/एफपीओ की कीमत कैसे होती है और उनका प्रदर्शन कैसा रहता है? क्या सेबी के नए नियम एफपीओ के लिए बेहतर कीमतों को तलाशने में मददगार होंगे?
पीएसयू को एफपीओ के लिए सेबी द्वारा घोषित किया गया नया विकल्पीय रास्ता अपनाना चाहिए। फ्लोर प्राइस के आवंटन के द्वारा जहां रिटेल निवेशकों को कवर कर लिया जाएगा वहीं कुछ संस्थागत निवेशकों से नीलामी में सरकार ज्यादा पैसे प्राप्त कर सकती है।
रिटेल निवेशक को क्या करना चाहिए ? क्या उन्हें आने वाले नए ऑफरों में निवेश करना चाहिए? उन्हें किन बातों पर निगाह रखनी चाहिए? रिटेल निवेशकों को सभी तरह के पीएसयू में निवेश करना चाहिए। रिटेल निवेशकों को इसमें पूंजी की सुरक्षा भी मिलती है। निवेश के बारे में उन्हें लांग टर्म और मिड टर्म सोचना चाहिए और हां, सूचीबद्ध होने के दौरान ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। जहां तक लिस्टिंग प्राइस की बात है तो वह बाजार की स्थिति/टेक्निकल्स और कई गैर-बुनियादी मुद्दों पर निर्भर करता है।

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