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दोस्ती जम के करो, पर ये गुंजाइश रहे

सभी राष्ट्र यह सोचते हैं कि उन्हें वरदान प्राप्त है। लेकिन इस मामले में अमेरिका की अपने बारे में राय कुछ ज्यादा ही आला किस्म की है। यह अमेरिका का राष्ट्रीय मिथक है कि उसके आदर्शों और नेताओं में कोई खोट नहीं है। वे न सिर्फ इस देश के नागरिकों के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हैं। जार्ज डब्लू. बुश जब यह कहते हैं कि अमेरिका ‘धरती का सबसे महान देश है और यह इंसानियत के लिए सबसे बेहतर और आखिरी उम्मीद है’ तो वे सिर्फ अपनी, या अपनी पार्टी की या फिर अपने तरह के राजनीतिकों की बात नहीं कर रहे होते। उनके इस बयान का एक हिस्सा उनके पहले के राष्ट्रपति का है और न सिर्फ उनके बाद बनने वाले राष्ट्रपति वरन अमेरिका के सारे मतदाता भी इसके दोनों ही हिस्सों से सहमत हैं। और अमेरिका का बुद्धिजीवी वर्ग भी यही मानता है।
नतीजा यह है कि अगर कोई देश अमेरिका की नीति या उसके किसी पक्ष से असहमत होता है तो उसे दुष्ट या मूर्ख मान लिया जाता है। इसे शायद ही कभी स्वीकार किया जाता हो कि वे अगर अमेरिका के साथ नहीं खड़े हैं तो हो सकता है कि इसका कोई वाजिब कारण हो। न्यूज़वीक पत्रिका में हाल ही में छपा एक लेख इसी लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारत के प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने अमेरिका जाने वाले हैं और इसी संदर्भ में लिखा गया यह लेख भारत अमेरिका रिश्तों के बारे में एक नजरिया पेश करता है। लेख कुछ इस तरह से शुरू होता है-
‘अभी हाल-फिलहाल तक भारत महाशक्तियों खासकर अमेरिका की आंख में उंगली डालने में गर्व महसूस करता था। 1950 के दशक की शुरुआत से भारत गरीब और औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए उन देशों का नेता था, जिन्हें गुट निरपेक्ष कहा जाता था। लेकिन यह संगठन नियमित रूप से सोवियत संघ की तरफ झुक जाता था और अमेरिकी साम्राज्यवाद की निंदा करता था। भारत ने बार-बार संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के खिलाफ वोट दिया। यहां तक कि बर्लिन की दीवार गिर जाने के बाद भी और भारत द्वारा सोवियत प्रेरणा से बनी आर्थिक योजनाओं को छोड़ देने के बाद भी नई दिल्ली ने हर मौके पर अमेरिका का रास्ता रोकने की नीति बनाए रखी।’
यह दो देशों के रिश्तों के इतिहास की गुमराह करने वाली व्याख्या है। सच तो यह है कि उन्होंने ही हमसे मुंह मोड़ लिया था। 1950 के दशक की शुरुआत तक तो भारत ने दुनिया के दूसरे बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र से अच्छे रिश्ते बनाने की कोशिश की थी। लेकिन 1954 में जब अमेरिकी विदेश सचिव जॉन फोस्टर डलेस ने पाकिस्तान से हथियारों का समझौता किया तो वह अमेरिका का ग्राहक देश बन गया था। हालांकि उस समय तक भारत यह कोशिश कर रहा था कि शीतयुद्ध में वह किसी का पक्ष न ले। और पाकिस्तान को अमेरिकी हथियार मिलने के बाद भी भारत की पश्चिमी यूरोप के देशों से अच्छी दोस्ती रही।
न्यूज़वीक के लेखक को संयुक्त राष्ट्र की जिस वोटिंग को लेकर शिकायत है, वह अमेरिका के खिलाफ नहीं थी, वरन उपनिवेशवाद के खिलाफ थी। 1960 के दशक में भारत और अमेरिका के राजनयिकों में मुख्य विवाद फिलस्तीन और वियतनाम को लेकर ही था। भारत सही था जब वह कह रहा था कि इज़राएल को फिलस्तीनियों को बराबरी के अधिकार देने चाहिए। और वियतनाम में अमेरिका पर युद्ध करने का आरोप लगाना भी पूरी तरह सही था। यह ठीक है कि जब अमेरिका की बात आती तो जवाहर लाल नेहरू कुछ ज्यादा ही ऊंचे आदर्शो की बात करने लग जाते। और फिर हमारे बुद्धिजीवियों का एक बडा वर्ग वामपंथी था जो पश्चिम के पूंजीवाद और अमेरिका का घोर विरोध करता था।
लेकिन हाल के कुछ साल में दोनों देश एक दूसरे के करीब आए हैं। न्यूज़वीक के लेखक का मानना है कि इसका कारण मौजूदा प्रधानमंत्री की नीतियां हैं। उनका दावा है कि ‘मनमोहन सिंह भारत को एक ऐसी ताकत के रूप में रीपोजीशन कर रहे हैं, जो हां बोल सकती है।’ उनकी तारीफ इसलिए की गई है कि भारत अब ग्लोबल वार्मिंग और दूसरे वैश्विक मुद्दों से इनकार नहीं करता और सहयोग को तैयार रहता है। एक बार फिर इतिहास का सही हवाला देने की जरूरत है। न कहने की आदत तो अमेरिका की भी रही है। 1997 में अमेरिका ने क्योटो संधि पर दस्तखत से इनकार कर दिया था। अगर वह दस्तखत कर देता तो भारत और चीन भी इसके लिए मजबूर होते और जीने के लिए अब तक यह दुनिया ज्यादा ज्यादा बेहतर और स्वच्छ हो चुकी होती। 2003 में अमेरिका दुनिया के जनमत के खिलाफ होने के बावजूद इराक में घुसा था। बारूदी सुरंगों पर पूरी तरह पाबंदी लगाने वाली संधि पर उसने अभी तक अपनी सहमति नहीं दी है। लेख आगे कहता है कि 24 नवंबर को मनमोहन सिंह जब व्हाइट हाउस आएंगे तो अमेरिकी खेमे में भारत की पहुंच और बढ़ जाएगी। साथ ही यह चेतावनी भी है कि अगर भारत अभी भी न करता रहा तो पिछड़ जाएगा।
पहले जब भारत के राजनीतिक, बुद्धिजीवी और संपादक अमेरिका की आलोचना करते थे तो कभी-कभी (हमेशा नहीं) इसके वाजिब कारण भी होते थे। अब इन्हीं लोगों की इच्छा है कि भारत अमेरिका का दोस्त बने। इस इच्छा से तो मैं सहमत हूं लेकिन यह दोस्ती का अर्थ मातहत बनना नहीं होना चाहिए।
मनमोहन सिंह ने पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति से कहा था कि भारत के लोग उन्हें काफी प्यार करते हैं। मुङो उम्मीद है कि ऐसी कोई बात वे ओबामा से नहीं कहेंगे, हालांकि जार्ज डब्लू. बुश के मुकाबले भारत के लोग ओबामा को ज्यादा प्यार करते हैं। फिर मनमोहन सिंह को भी अमेरिकी खेमे में भारत की पहुंच बढ़ाने से बचना चाहिए। क्योंकि भारत को किसी खेमे के पीछे चलने वाला नहीं, बल्कि उभरती हुई ताकत बनना चाहिए। इसके साथ ही उसे दूसरे देशों से भी अच्छे रिश्ते बनाने चाहिए।
उद्योग और मीडिया जगत में एक बड़ी लॉबी है जो अमेरिका से हर हाल में दोस्ती बढ़ाने की हिमायत करती है। तर्क यह दिया जाता है कि हमें चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका की जरूरत है। हमें 1971 को याद कर लेना चाहिए। बांग्लादेश में जब अत्याचार शुरू हुए तो हमने अमेरिका से मदद मांगी। अमेरिका ने तब अत्याचार करने वाले पाकिस्तान की मदद की थी। इसलिए नहीं कि पाकिस्तान उसका बफादार था, बल्कि इसलिए कि कम्युनिस्ट चीन तक पहुंचने का रास्ता पाकिस्तान से निकलना था। यह फिर हो सकता है।
ramguha@vsnl.com
लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

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