DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हिन्दुस्तानियों के लिए सिरदर्द बन गए हैं राज

जब कानून बनाने वाले ही कानून को अपने हाथ में ले लें, तो क्या होता है? इसका नजारा हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा में दिखा। शपथ ग्रहण समारोह में वह शर्मनाक वारदात हुई। एक विधायक हिंदी में शपथ ले रहे थे। दूसरे विधायकों ने उसका विरोध किया।

अब हिंदी में शपथ लेने पर दूसरे विधायकों ने महज विरोध ही नहीं किया, उनकी पिटाई तक कर दी। पिटाई करने वाले चार विधायकों को सस्पेंड कर दिया गया है। उसी दिन भाषाई गुंडागर्दी करने वाले और नौ विधायकों को चेतावनी दे कर छोड़ दिया गया है। मुझे नहीं लगता कि उनके खिलाफ यह सही कार्रवाई हुई है। भाषाई दादागीरी को और बेहतर ढंग से निपटना चाहिए। ताकि देश में एका बना रहे। वह तरीका क्या होना चाहिए? यह अभी मैं नहीं बता सकता। लेकिन मुङो उम्मीद है कि दिल से अपने देश को चाहने वाले लोग उसका कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे।

बंबई नौ साल तक मेरा घर रहा है। वह एक कॉस्मोपॉलिटन शहर था। उसमें अलग-अलग किस्म की भाषाएं बोलने वाले अलग-अलग नस्लों और मजहबों के लोग रहते थे। ज्यादातर लोग अपनी मातृभाषा के साथ-साथ बंबईया हिंदी बोलते थे। मतलब आएंगा, जाएंगा, क्या मांगता, खल्लास वाली हिंदी। तब भाषा को लेकर कोई दिक्कत नहीं थी। हालात बिगड़ने तब शुरू हुए, जब बंबई का नाम बदल कर मुंबई हो गया। बाल ठाकरे की शिवसेना की वजह से वह सब हुआ। वह पार्टी कुल मिला कर मुस्लिम विरोधी थी। शिवाजी का नाम वे इसलिए लेते थे कि उससे लोगों की भावनाएं जुड़ी थीं। बाद में वे मुंबई के बाहर के सभी लोगों के खिलाफ नफरत उगलने लगे। उनके सबसे पहले शिकार तमिल हुए थे। उनके खाने-पीने के छोटे-मोटे ठिकाने बर्बाद कर दिए गए। सेना के ज्यादातर सदस्य झोपड़पट्टी से आए हुए गुंडे थे। उन्हें अपनी गुंडागर्दी से कुछ हासिल ही होना था। उनके कुछ भी खोने का तो सवाल ही नहीं था।

अब बाल ठाकरे बूढ़े शेर हो गए हैं। और उनके बेटे उद्धव मिमियाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। शायद इसीलिए नफरत के सौदागर की भूमिका में उनके भतीजे राज ठाकरे आ गए हैं। उन्होंने तो नफरत का दायरा भी खासा बड़ा कर दिया है। उनके दायरे में सभी गैर महाराष्ट्रियन आ गए हैं। उसमें भी बिहारी और उत्तरप्रदेश वाले खासतौर पर हैं। ये सब करने से उनकी पार्टी चमकने लगी है। उसका असर हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में दिखा। राज की पार्टी को 13 सीट मिल गईं। फिलहाल राज सभी सोचने-विचारने वाले हिंदुस्तानियों के लिए सिरदर्द बन गए हैं। मेरा मानना है कि जब राज ने पहली बार नफरत के बीज बोए थे, तभी उन्हें जेल की हवा खिला देनी चाहिए थी। लेकिन अपने पास ऐसे नेता ही कहां हैं, जिनमें इतना दम हो। मुझे लगता है उनके लिए एक और तरीका हो सकता है। उन्हें पटना में लालू यादव और लखनऊ में मुलायम सिंह यादव का मेहमान बना देना चाहिए। दरअसल, उन्हें बताया जाना चाहिए कि किस तरह लोगों से बर्ताव किया जाता है। इस देश में बहुत सारे लोग उनके ‘मराठी माणुस’ के विचार को न समझ पाएं। लेकिन इतना तय है कि वे उनसे कहीं बेहतर नागरिक हैं।

बेहतरीन लेखन सीधा-सादा गद्य लेखन भी कविता जैसा यादगार बन सकता है। लेखन की दुनिया को यह सच समझने में बहुत वक्त लगा। कविता व्याकरण के साथ अच्छा-खासा खेल कर लेती है। इसी वजह से वह लय में नजर आती है। गद्य का लेखन व्याकरण के मुताबिक करना होता है। लेकिन उसके भी नतीजे उतने ही बेहतर हो सकते हैं। जहां तक मेरी जानकारी है बेहतरीन गद्य लेखन को पहली बार लंदन की ‘ग्रांटा’ में छापा गया था। उसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया था। कुछ हिंदुस्तानी महसूस करते थे कि उनके लोग इंग्लैंड के लेखकों से बेहतर लिखते हैं। तो यहां से कुछ निकालने का मन बना। उसकी शुरुआत करने वाली अर्थशास्त्री थीं। धर्मा कुमार ने उसका बीड़ा उठाया। रवि दयाल को मनाने में उन्हें जरा भी देर नहीं लगी कि ‘ग्रांटा’ का हिंदुस्तानी संस्करण निकाला जाए। उसका नाम तय हुआ ‘सिविल लाइन्स’। ब्रिटिश राज की याद दिलाता लफ्ज, लेकिन ठेठ हिंदुस्तानी, क्योंकि वह इंग्लैंड में नहीं मिलता। धर्मा कुमार और रवि दयाल दोनों ही दुनिया में नहीं हैं। अब रुकुन आडवाणी ने एक किताब ‘रिटन फॉर ऐवर: द बेस्ट ऑफ सिविल लाइन्स’ पर काम किया है। वह रवि दयाल और पेंगुइन-वाइकिंग से आई है। उसमें कल और आज के बेहतरीन हिंदुस्तानी अंगरेजी लेखक शामिल हैं। लेकिन विक्रम सेठ, सलमान रुश्दी और डॉम मोरेस को छोड़ दिया गया है। मैं नहीं जानता ऐसा क्यों हुआ है? लेकिन जो कुछ भी है, वह छूट गए से कहीं ज्यादा है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:हिन्दुस्तानियों के लिए सिरदर्द बन गए हैं राज