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जिंदगी से शिकायत

वह अक्सर मेरे ऑफिस चले आते हैं। अच्छी-खासी सरकारी नौकरी में हैं। अभी कुछ साल रिटायरमेंट के बचे हैं। जिंदगी में सब कुछ ठीक-ठाक लगता है। कोठीनुमा घर है। बीवी भी कमाती हैं। दोनों बच्चे कायदे से ‘सेटल’ हो गए हैं। लेकिन वह परेशान ही नजर आते हैं। एक दिन आए, तो किसी नई परेशानी का जिक्र कर रहे थे। मैंने कहा कि प्रभु सब ठीक कर देंगे। तो छूटते ही बोले, ‘प्रभु का तो नाम ही मत लो। उन्होंने हमारे लिए किया ही क्या है?’

अपनी तरफ से उन्हें समझाने की कोशिश करता रहा। लेकिन उन पर कोई असर नहीं पड़ा। उनके जाने के बाद न जाने क्यों नारायण भट्ट तिरी जेहन में आते रहे। एकदम तो मैं नहीं समझ पाया था, लेकिन मुझे लगा कि किसी ‘कंट्रास्ट’ की वजह से ऐसा हो रहा है। मेरे दोस्त के पास सब कुछ है, लेकिन वह दुखी हैं। भट्ट तिरी के पास कुछ भी नहीं बचा था फिर भी उन्हें अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी।

भट्ट तिरी का शरीर लकवा झेल रहा था। असल में गुरुदक्षिणा में ही उन्होंने गुरु के लकवे को अपने ऊपर ले लिया था। उसे लेने के बाद भी वह सार्थक जिंदगी जीना चाहते थे। वह कैसे सार्थक जीवन जीएं, इसी तलाश में थे। तभी एक ज्योतिषी ने उनसे कहा था, ‘गुरुवायूर क्यों नहीं जाते? वहां नारायण की स्तुति करो न।’ नारायण की स्तुति भी कहां से शुरू करें? उस उधेड़बुन को दूर-दूर किया महान मलयाली कवि एड़त्ताचन ने। उनके मुंह से निकला, ‘मीन तोट्ट 'कट्ट'’। मछली यानी मत्स्य से शुरुआत करो।

वह समझ गए। गुरुवायूर पहुंचे और भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार से उन्होंने नारायण की लीला का बखान करना शुरू किया। पूरे सौ दिन उन्होंने नारायण के लिए रोज के दस श्लोक लिखे। यही ‘नारायणीयम्’ है। संस्कृत में नारायण की स्तुति में लिखा गया महान ग्रंथ। उसे ‘विष्णु सहस्रनाम्’ से जोड़ने का मन होता है। उसमें प्रभु के हजार नाम हैं, इसमें नारायण के हजार श्लोक हैं।

भट्ट तिरी को अपनी जिंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं हुई। वह उस बीमारी को अपने लिए वरदान मानते रहे। इसीलिए वह प्रभु का गान कर सके। वह ठीक होते, तो किसी राजा-महाराजा का गुणगान कर रहे होते।

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