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परस्पर प्रेम का उत्सव

ागुन मास की पूर्णिमा की फसल सब फसलों में सर्वश्रेष्ठ और सिरमौर मानी जाती है। यही वह समय होता है, जिसमें वर्ष भर अन्न प्रदान करते रहन की व्यवस्था है। इस समय को कल्याणकारी और सौभाग्यसूचक समझ कर आनन्दोत्सव मनाना स्वाभाविक है। परस्पर प्रेम में वृ िकरन का यह उचित अवसर है। इस पर्व पर सब लोग ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का विचार छोड़कर स्वच्छ हृदय से आपस में मिलते हैं। यदि किसी कारणवश वर्ष में वैर-विरोध ने मनों में जगह बना ली है तो उनको अग्निदेव की साक्षी में भस्मसात् कर लिया जाता है। अत: होली प्रेम-प्रसार का पर्व है। यह हमें एकता का पाठ पढ़ाता है। यह वर्ष भर प्रेम में तन्मय हो जान का सबसे उत्तम साधक है। मनुष्य में भावनाओं के दमन से विकृति पैदा होती है। यदि भावनाओं को परिष्कृत उल्लास में बदलकर समूह की शक्ित का उसमें समावेश किया जा सके व उसे आध्यात्मिक उत्सव का रूप दिया जा सके तो इससे समाज का स्वरूप बनेगा। होली को कुण्ठाहीनता और अन्यान्य मनोग्रंथियों से छुटकारा देने वाले पर्व के रूप में मनाया गया है। स्वच्छ मनोवृत्ति को विकसित करना ही इसका मकसद रहा है। पर्व की परम्परा जनश्रद्धा को उल्लासपूर्ण तरीके से विवेकसम्मत मार्गदर्शक प्रदान करन के लिए थी, परन्तु आज विसंगतियां आ गई हैं। यही कारण है कि रंगां का त्योहार बदरंग होता जा रहा है। कहीं-कहीं काल की कराल गति ने आज त्योहार में कदाचार और अभद्र व्यवहार भर दिया है। पर्वो के मर्म को भूल जान का परिणाम है कि हिरण्यकश्यपु भावनाओं के प्रह्लाद को मिटा देन के लिए सचेष्ट है। उसकी कुत्सित चेष्टा को मिटा देना तभी संभव है, जब नरसिंह का प्रचंड पराक्रम सक्रिय हो जाए। आइये, सारे द्वेषभावों, सारी संकीर्णताओं के बंधनां को तोड़ दें और निश्चल प्रेम की रसधार बहा दें। ऐसी होली खेलें, सारा समाज, सारा राष्ट्र तरंगित हो उठे। होली का गुलाल हमारे मनों के मलाल को मिटा सके।ं

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