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मुजीब को न्याय

बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान के बारह हत्यारों की फांसी की सजा बरकरार रखने को लोकतंत्र की जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह बांग्लादेश की प्रधानमंत्री और मुजीब की बेटी शेख हसीना वाजेद की भी जीत है और उनके लिए भावुक क्षण भी है। इसी दिन भारत की तरफ से उन्हें विकास और निरस्त्रीकरण के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा उनके लिए दोहरा उपहार है। इस मौके पर इंदिरा गांधी और मुजीबुर्रमान की मित्रता और बांग्लादेश की मुक्ति की लड़ाई में उनकी भूमिका की याद आना स्वाभाविक है। इन चौंतीस सालों में बांग्लादेश की राजनीति और भारत-बांग्लादेश के रिश्तों ने काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। आज जब दोनों देश फिर एक दूसरे के करीब आ रहे हैं तो इसका श्रेय बांग्लादेश में हुई लोकतंत्र  की बहाली को दिया जाना चाहिए। मुजीब को यह इंसाफ चौंतीस साल बाद मिला है पर इसके लिए लोकतंत्र को दोषी नहीं बताया जाना चाहिए। वहां जब लोकतंत्र आया तो मुजीब को इंसाफ देने का प्रयास हुआ और जब सैनिक बगावत या उससे निकली सरकार आई तो कानून बना कर उस कायराना और नृशंस हत्या को भुला देने की कोशिश हुई। अगर 1996 में हसीना ने इंसाफ की प्रक्रिया की कानूनी बाधाओं को हटाया तो 2001 में आई बेगम खालिदा जिया की सरकार ने फिर दिक्कतें पैदा करनी शुरू कर दीं। इसीलिए ढाका हाई कोर्ट ने जो सजा 1998 में मुकर्रर कर दी थी उस पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगने में 11 साल लग गए। लेकिन इस इंसाफ के अंजाम तक पहुंचने में अभी भी कुछ बाधाएं हैं। बहुत संभव है कि ढाका जेल में बंद छह मुजरिमों को राष्ट्रपति की तरफ से कोई माफी न मिले और उन्हें फांसी हो जाए। लेकिन उन पांच मुजरिमों का क्या होगा जो अमेरिका, लीबिया, कनाडा और पाकिस्तान में पनाह लिए बताए जाते हैं। एक मुजरिम जिंबाव्वे में कुछ साल पहले मर गया बताया जाता है। लेकिन बाकी को वापस लाने में दिक्कतें इसलिए है कि इनमें से किसी देश के साथ बांग्लादेश की प्रत्यर्पण संधि नहीं है। इन्हीं राजनीतिक और कानूनी अड़चनों के कारण आतंकवादी भी दूसरे देश में पनाह लेकर सजा पाने से बचे रह जाते हैं।

इसलिए यह मौका अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक बिरादरी की निष्ठा और बांग्लादेश की लोकतांत्रिक मशीनरी के इम्तहान का भी है। अगर बिना किसी सैन्य असंतोष के हसीना वाजेद सेना के उन पूर्व अधिकारियों को फांसी दे पाती हैं तो मानना चाहिए कि वहां लोकतंत्र की जड़ें जम गई हैं।

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