DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सियासत गरम, पर बाबरी का मुकदमा ठंडा

बाबरी मस्जिद पर सियासत फिर गर्माने की कोशिश जरूर हो रही है लेकिन इसका मुकदमा अभी तक जारी ही है। 6 जनवरी सन् 1950 को फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में दायर गोपाल सिंह विशारद बनाम जहूर अहमद का मुकदमा अब हाईकोर्ट में है। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाने का मुकदमा भी जारी है। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जीलानी का कहना है कि अगले साल इस मुकदमे को साठ बरस पूरे हो जाएंगे और इसके बाद भी इस पर अदालती फैसला कब होगा कोई नहीं जानता।

हिन्दुस्तान से बातचीत में उन्होंने अभी तक अदालती फैसला न आने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों की उदासीनता को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि मुकदमे की सुनवाई कर रही हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के जज न्यायमूर्ति एस.आर.आलम तीन माह पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाए गए। उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस मुकदमे की सुनवाई में शामिल होने से मना कर दिया, मगर अभी तक न्यायमूर्ति आलम के बाबत कुछ भी तय नहीं हो सका। बाबरी मुकदमे की सुनवाई तीन महीने से ठप है। कोई अगली तारीख भी तय नहीं है।

उन्होंने कहा कि यह बात प्रधानमंत्री तक भी पहुँचाई गई। केन्द्र चाहता तो मामले की संवेदनशीलता के आधार पर सुप्रीम कोर्ट से खुद इस बाबत बात कर सकता था। हाईकोर्ट की इसी बेंच के एक और जज न्यायमूर्ति ओ.पी.श्रीवास्तव का कार्यकाल समाप्त होने वाला था। मुख्य न्यायाधीश ने उनका कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ाए जाने की सिफारिश की। एक साल का कार्यकाल तो बढ़ा उसके बाद फिर राज्य सरकार ने इस पर एतराज कर दिया। फिर उनके स्थान पर न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल आए।

श्री जीलानी ने कहा कि सीबीआई की कोर्ट में चल रहा आपराधिक मुकदमा भी लेटलतीफी का शिकार है। श्री जीलानी ने आरोप लगाया कि सीबीआई इस मामले में खुद दिलचस्पी नहीं ले रही। चार साल में अब तक सात गवाह पेश हुए हैं जबकि चार साल में मुकदमा खत्म हो जाना चाहिए था।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सियासत गरम, पर बाबरी का मुकदमा ठंडा