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समय कम है धरती को बचाने के लिए

हमारे नीति निर्माता जिन मुद्दों को लेकर व्यस्त हैं, उनमें से एक प्रमुख विषय है कोपेनहेगन में ग्लोबल वार्मिग और जलवायु परिवर्तन पर होने वाली बैठक। इस संबंध में हुआ समझौता क्योटो प्रोटोकाल 2012 में समाप्त हो जाएगा। हालांकि समझौते को अमेरिकी और आस्ट्रेलियाई समर्थन नहीं था, लेकिन बहुत से यूरोपीय देशों ने उत्सर्जन के स्तर को नीचे लाने का प्रयास किया। कोपेनहेगन की बैठक में समझौते को अंतिम रूप दिया जाएगा और पुराने समझौते के स्थान पर नया समझौता किया जाएगा। नए समझौते पर सभी देशों, विशेषकर अमेरिका की सहमति होगी।

इस बात के वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि कार्बन डाइक्साइड के उत्सर्जन के परिणास्वरुप ग्लोबल वार्मिग का हमारे जीवन पर गहरा असर हो रहा है और यह इस ग्रह के भविष्य को भी संकट में डाल रही है। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, दोनों ध्रुवों के हिमशिखरों में कमी और समुद्र का बढ़ता जल स्तर हमारे जीवन के लिए खतरा है। उदाहरण के लिए समुद्र का जल स्तर बढ़ने से दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा डूब जाएगा। मारीशस पहले से ही नया ठिकाना तलाश रहा है। 

मालद्वीव, सेशल्स, भारत में सुंदरवन, बंगलादेश का काफी हिस्सा और तटीय शहर पानी में चले जांएगे तब दूसरे क्षेत्रों में निवास ढूंढना होगा। मानसून, चक्रवात और तूफान की अभूतपूर्व गति का परिणाम कृषि ढांचे के विनाश के रूप में सामने आएगा। स्पष्ट है कि मौजूदा लक्ष्य असंभव है। पूरे विश्व में वर्तमान जीवन शैली और आर्थिक गतिविधियां जीवाश्म ईंधन पर आधारित हैं। जीवाश्म ईंधन ऊर्जा में कार्बन डाइक्साइड के उत्सर्जन का स्तर बहुत ज्यादा है, जिससे ग्लोबल वार्मिग होती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार 2050 तक प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दो टन कार्बन डाइक्साइड के समतुल्य रहना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि विकसित देशों का 1990 में उत्सर्जन का जो स्तर था उसे 2050 तक 90 प्रतिशत तक कम करना होगा। लेकिन विकासशील देशों को भी उत्सर्जन में भारी कटौती करनी होगी। अगर आर्थिक गतिविधि और विकास दर बढ़ती है तो यह निर्धारित लक्ष्य से तेजी से बढ़ेगी।

भारत जैसे देश में वर्तमान उत्सर्जन केवल 2 प्रतिशत है, लेकिन 8-9 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर से प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में नाटकीय वृद्धि होगी। भारतीय तर्क है कि यह समस्या अमेरिका, यूरोप और अन्य विकसित देशों द्वारा पैदा की गई है, इसलिए उत्सर्जन नियंत्रण का जिम्मा भी उन्हें ही उठाना चाहिए। भारत जैसे देशों पर उत्सर्जन कम करने का दबाव बनाना खतरनाक है क्योंकि इसका विकास पर प्रतिकूल असर हो सकता है और गरीबी कम करने के प्रयासों को धक्का पहुंच सकता है। कम प्रदूषण वाली ऊर्जा बनाने की प्रौद्योगिकी महंगी हैं। जाहिर है कि विकासशील देश विकसित देशों से यह प्रौद्योगिकी और वित्त का आश्वासन चाहते हैं। केवल इन साधनों से ही वे कम उत्सर्जन के साथ उच्च विकास दर की उम्मीद कर सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय रूपरेखा में पांच मसले शामिल किए जा सकते हैं। पहला, उत्सर्जन में कमी लाने के लिए मध्यवर्ती लक्ष्य तय करना। दूसरा, जलवायु परिवर्तन के अपरिहार्य परिणामों से निपटने के अनुकूल प्रयास करना। तीसरा, कम उत्सर्जन पैदा करने वाली योजनाओं के लिए वित्तीय व्यवस्था करना। चौथा, कम कार्बन आधारित उन्नत तकनीक। पांचवां, एक सरल और दूरंदेशी रूपरेखा बनाना जिसमें ये चारों चीजें शामिल हो जाएं।

मापन, रिपोर्टिग और सत्यापन (एमआरवी) इससे संबंधित मुद्दे हैं। यदि भारत जैसा कोई देश उत्सर्जन में कमी लाने के लिए कदम उठाता है तो कौन सी प्रक्रिया और संस्थान यह सत्यापित करेगा कि वास्तव में उत्सर्जन में कमी लाई गई है। उत्सर्जन में कमी का जब तक वास्तविक नाप तौल और सत्यापन नहीं होगा तथा यह सुनिश्चित नहीं होगा कि उत्सर्जन में कटौती वास्तव में हुई है तब तक विकसित देश वित्त उपलब्ध कराने को तैयार नहीं होंगे।

इस से संबंधित भारत की स्थिति यह है कि उत्सर्जन नियंत्रण पर बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के बजाए हम अपने हित में स्वैच्छिक कार्रवाई करेंगे। यह सामान्य लेकिन विभेदकारी दायित्व के सिद्धांत पर आधारित है। सामान्य इसलिए कि कार्बन डाइक्साइड में कटौती विश्व की चिंता का विषय है। फर्क इसलिए कि उत्सर्जन नियंत्रण के प्रयासों की तीव्रता और तरीका अमेरिका और भारत में एक जैसा नहीं हो सकता, क्योंकि अमेरिका में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन शायद भारत से तीस गुना ज्यादा हो सकता है।

भारत का लगातार यह दृष्टिकोण रहा है कि प्रौद्योगिकी और वित्त, जो बाहरी मदद से उपलब्ध हो जाते हैं, मिलने पर हम सफलतापूर्वक ऐसे खुलासे कर सकते हैं। लेकिन घरेलू वित्त और प्रौद्योगिकी से हम जो स्वैच्छिक कार्रवाई करेंगे उसका खुलासा घरेलू छानबीन में ही करेंगे।
   
कोपेनहेगन की बैठक में उठाने के लिए इससे संबंधित एक और मसला है जो कुछ हद तक भारत के लिए प्रासंगिक है। यह ब्लैक कार्बन और ओजोन से जुड़ा है जो कार्बन डाइक्साइड के विपरीत बहुत कम समय के लिए वातावरण में रहता है। ब्लैक कार्बन वायु प्रदूषण के कणों का व्यापक रूप है जो हवा को गंदा करता है। अधूरा दहन ऊर्जा अपशिष्ट का संकेत है। खराब ढंग से रखे गए इंजन और डीजल से चलने वाले वाहनों व जहाजों, जंगल की आग, लकड़ी का प्रयोग करने वाले कारखानों तथा घरों से यह पैदा होता है। 

लकड़ी के वर्तमान प्रयोग और ग्रामीण भारत में गाय के गोबर की तरह पशुओं की गंदगी से ब्लैक कार्बन और कालिख पैदा होती है। एलपीजी जैसे स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल से प्रदूषण कम करने में भारी मदद मिलेगी। ब्लैक कार्बन दो तरह से पर्यावरण को बदलता है। बिखरे कणों से वातावरण गरम हो जाता है और पृथ्वी भी। आर्टिक बर्फ पिघलती है। हिमालय और तिब्बत ग्लेशियरों के पिघलने का कारण कार्बन डाइक्साइड से ज्यादा ब्लैक कार्बन है। कार्बन डाइक्साइड की तुलना में ब्लैक कार्बन और ओजोन को कम करने के लिए कदम उठाना ज्यादा आसान है।

हम मनुष्य के एकमात्र घर के भविष्य से समझौता बर्दाश्त नहीं कर सकते। यही कारण है कि दिसंबर के शुरू में होने वाली कोपेनहेगन बैठक महत्वपूर्ण है। बहरहाल, पांचों प्रमुख मसलों, विशेष रूप से उत्सर्जन नियंत्रण पर बाध्यकारी प्रतिबद्धता, पर इतने कम समय में समझौता संभव नहीं हो सकता। शायद कोपेनहेगन घटना की बजाय कोपेनहेगन प्रक्रिया पर विचार करना ज्यादा यथार्थवादी हो सकता है। कोपेनहेगन में संधि के लिए विस्तृत राजनीतिक रुपरेखा तैयार हो सकती है, जिसमें संभव है कि पांचों प्रमुख मुद्दों के लिए कार्रवाई शामिल हो। समय कम है। राजनीतिक नेताओं को दूरदर्शिता, जिम्मेदारी और तत्परता से काम लेना होगा। इसके लिए हम खुद अपने और भावी पीढ़ियों के आभारी होंगे।

hindustanfeedback@gmail.com

लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं 

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