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केरल : राहुल का जादू चल गया

इस महीने के आरंभ में जिन तीन विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव हुए थे, कांग्रेस ने उन सभी को बरकरार रखा है। इस प्रकार 180 सदस्यीय विधानसभा में यूडीएफ और एलडीएफ की सीटों का 42 और 98 का अनुपात पहले जैसा बना रहा। चूंकि सत्तारूढ़ एलडीएफ इतनी मजबूत स्थिति में है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ इन चुनावों से सत्ता का समीकरण बदल पाने की स्थिति में बिलकुल नहीं है। हालांकि यह चुनाव दोनों मोचरे ने पूरा जोर लगाकर लड़ा था। इसके बावजूद इन चुनावों से एक महत्वपूर्ण संदेश निकलता है।

उपचुनावों की खास बात यह रही है कि यूडीएफ के उम्मीदवारों ने तीनों चुनाव साफ बहुमत से जीता। इससे यह पता चलता है कि संसदीय चुनावों में केरल में जो सकारात्मक रुझान बना था वह अभी जारी है। मतदाताओं ने सन् 2006 के विधानसभा चुनावों में जो जनादेश दिया था उसे 2009 के आम चुनावों में पलट दिया था।
मतदाताओं ने पहले यूडीएफ को कड़ा सबक सिखाया था और इस साल वैसा ही सबक एलडीएफ को सिखाया। इस माह के उपचुनाव की खास बात यह भी थी कि वह शांतिपूर्ण रहा और उस दौरान कोई घटना नहीं घटी। एक बात यह भी रही कि मतदाताओं ने जम कर वोट डाले। इन उपचुनावों का प्रचार जबरदस्त था और किसी पक्ष ने कोई कसर नहीं उठा रखी थी।

माकपा के नेतृत्व वाला एलडीएफ चाहता था कि वह कम से कम एक सीट कांग्रेस से छीन ले, ताकि राज्य में अपना दबदबा जता सके। कांग्रेस के लिए उतना ही महत्वपूर्ण यह साबित करना कि 2009 का लोकसभा चुनाव कोई अचानक हुआ चमत्कार नहीं था, जिसे दोबारा दोहराया नहीं जा सकता। दोनों खेमों में जीत का विश्वास था पर उसकी वजहें अलग-अलग थीं।

चूंकि कन्नूर, एरनाकुलम और अलपुझा नाम के यह तीनों क्षेत्र कांग्रेस के गढ़ रहे हैं और पिछले विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस का तंबू उखड़ गया, तब भी यह सीटें उसे ही मिली थीं। इसीलिए कांग्रेस को यकीन था कि वह इन सीटों पर विजय प्राप्त करेगी। जबकि एलडीएफ सत्ता में रहते हुए कभी उपचुनाव हारा नहीं था, इसलिए उसे विश्वास था कि उसका यह रिकार्ड टूटेगा नहीं। कांग्रेस के लिए बड़े संतोष की बात है कि उसने न सिर्फ तीनों सीटें जीत लीं, बल्कि दो सीटों पर उसकी जीत का फासला भी बढ़ा।

इस लिहाज से महज अलपुझा सीट पर पार्टी की थोड़ी किरकिरी हुई। इस सीट पर जीत का अंतर सिर्फ पांच हजार था, जबकि पिछली बार यह अंतर दस हजार का था। कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना था कि जीत का अंतर इसलिए घटा क्योंकि पार्टी ने वहां से एक मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा किया था। उन नेताओं का मानना है कि पिछले चार दशकों में अलपुझा से कभी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं खड़ा किया गया।

इस बार मतदाताओं की उदासीनता दूर करने का यह श्रेय बेझिझक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव राहुल गांधी को जाता है। इस युवा नेता ने एक दिन तिरुवनंतपुरम, कोची और कोझीकोड के विभिन्न कॉलेजों के छात्रों के साथ बातचीत में बिताए। संसदीय चुनाव के बाद यह राहुल गांधी की पहली केरल यात्रा थी और वह भी उपचुनावों के एक महीना पहले। युवाओं से संवाद के दौरान उनका जोर इस बात पर था कि किस प्रकार व्यवस्था को स्वच्छ बनाने के लिए युवाओं को राजनीति में आना चाहिए।

उन्होंने युवा संगठनों के लोकतांत्रिकरण और युवाओं को राजनीति में लाने पर जोर दिया। उनकी यह बात भी लोगों को जंची कि कांग्रेस पार्टी युवक कांग्रेस और एनएसयूआई में आंतरिक लोकतंत्र कायम करने की प्रक्रिया चला रही है। तिरुवनंतपुरम में वीवीआईपी सुरक्षा घेरा तोड़ कर किनारे खड़े युवाओं से बात करना या कोङीकोड में अचानक अपना काफिला रोक कर काफी पीना, राहुल गांधी का यह तरीका लोगों को भा गया। उनका वह दौरा जबरदस्त रूप से सफल था और उससे सत्तारूढ़ खेमे में खलबली मच गई थी।

राज्य के दो मंत्रियों सहकारिता मंत्री जी. सुधाकरण और बिजली मंत्री ए. के. बालन ने उसे मुद्दा बनाया। सुधाकरण ने कहा कि राज्य में वीवीआईपी दौरे के कारण यातायात जाम होता है। जबकि बालन ने सोनिया गांधी के अपने बेटे की फिलूजखर्ची पर रोक लगाने की अपील कर डाली। उनका कहना था कि राहुल गांधी के एक दिन के दौरे पर राज्य के खजाने पर डेढ़ करोड़ रुपए खर्च हो गया। जबकि कांग्रेस पार्टी ने सोच रखा था कि राहुल गांधी के दौरे से उपचुनाव का बेहतर माहौल बनेगा और वह हुआ भी। इसीलिए एलडीएफ अपने जबरदस्त प्रचार के बावजूद लोकसभा चुनाव में खाई मात की बाजी पलट नहीं सका।
 
radhaviswanath73@yahoo.com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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