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धुएं से जंग

भारत ने कोपेनहेगन सम्मेलन और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए बड़ा कदम उठा लिया है। बढ़ते वायु प्रदूषण के खिलाफ केंद्र सरकार ने यूरोप जैसे कड़े मानक जारी कर दिए हैं। हालांकि उन्हें लागू किए जाने के लिए अभी उपयुक्त कानून नहीं हैं। पहले यह उम्मीद जताई जा रही थी कि भारत सहित अन्य विकासशील देश कोपेनहेगन में क्योटो संधि को विधिवत लागू करने के लिए औद्योगिक देशों पर दबाव बढ़ाएंगे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल के बाद पिछले कुछ दिनों में स्थितियां तेजी से बदली हैं।

अब न सिर्फ क्योटो संधि में संशोधन की बात हो रही है, बल्कि चीन और भारत जैसे देश कार्बन उत्सजर्न घटाने की अपनी जिम्मेदारियों बिना शर्त पूरा करने को तैयार हो रहे हैं। भारत 2012 से 2017 वाली अगली पंचवर्षीय योजना में कम कार्बन वाले टिकाऊ आर्थिक विकास की तैयारी कर रहा है। योजना आयोग ने इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया है। बुधवार को जारी किया गया मानक उसी दिशा में उठाया गया कदम है। इस कदम के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसे लागू किए जाने की है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2008 में देश के जिन 110 शहरों का सर्वेक्षण किया गया है, उनमें 88 प्रतिशत का प्रदूषण स्तर पुराने मानक के लिहाज से भी बहुत ज्यादा है। जब इन मानकों में ओजोन, आर्सेनिक, निकल और बेंजीन जैसे छह तरह के नए प्रदूषण को शामिल कर लिया जाएगा तो इन शहरों की स्थिति और भी खराब निकलेगी। यह बात सही है कि पिछले कुछ सालों में दिल्ली में  डीजल के व्यावसायिक वाहनों पर रोक लगाए जाने और सीएनजी ईंधन शुरू किए जाने के बाद प्रदूषण का स्तर काफी गिरा था। लेकिन यह रोक तब नाकाफी हो गई, जब डीजल गाड़ियों का बनना और सड़क पर आना जारी रहा। इससे जो भी प्रदूषण कम हुआ था, वह फिर उसी स्तर तक पहुंचने लगा है। लोगों की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें बढ़ने लगी हैं।

अगर नया मानक ठीक से लागू किया जाता है तो हवा को साफ बनाने में काफी मदद मिलेगी। लेकिन नए मानक को लागू करने के लिए कानून बनाने के साथ स्थानीय निकायों, लघु ऑटोमोबाइल उद्योग और लघु उद्योगों को भी तैयार करना होगा। उनके नफा-नुकसान पर विचार करते हुए उन्हें मदद भी करनी होगी और वह उपकरण भी प्रदान करने होंगे, जिनसे वे प्रदूषण रोकने की यूरोप जैसी कड़ी कसौटी पर खरे उतरें।

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