DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जलवायु परिवर्तन कोपेनहेगन पर टिकी उम्मीदें

कोपेनहेगन में अगले महीने 7-18 दिसंबर को होने वाली क्लाईमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक समझौता होना है। एजेंडा यह है कि इसमें विकसित और औद्योगिक राष्ट्र 2020 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती लाने की घोषणा करें तथा विकासशील और गरीब देशों को इन खतरों से निपटने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद देने का ऐलान करें।

इस राजनीतिक समझौते को 2010 में एक अंतर्राष्ट्रीय संधि का रूप दिया जाएगा जिससे इसके प्रावधानों को मानना सभी राष्ट्रों के लिए कानूनी बाध्यता होगी। इस समझौते से पृथ्वी को ग्रीनहाउस गैसों के खतरों से बचाने की जो मुहिम 1997 में क्योटो प्रोटोकाल से शुरू हुई थी उसे ठोस कार्यात्मक कदमों के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। 

कोपेनहेगेन में भारत का रुख क्या रहेगा ?
भारत का रुख साफ है कि जब तक औद्यौगिक और विकसित राष्ट्र अपनी उपरोक्त जिम्मेदारी को नहीं निभाते वह कोपेनहेगन जैसे किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर उत्सर्जन में कमी लाने की कोई भी कानूनी बाध्यता स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि भारत या किसी भी विकासशील राष्ट्र के लिए ऐसा करना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। ऐसी किसी कानूनी बाध्यता से देश के औद्यौगिक विकास को झटका लग सकता है।

देश के समक्ष पर्यावरण से भी बड़ी चुनौती गरीबी से निपटना है। देश में 30-35 करोड़ आबादी ऐसी है जिसकी प्रतिदिन की आय आधे डॉलर से भी कम है। इसलिए एक तरफ जहां भारत विश्व मंच पर अपने स्टैंड पर मजबूती से कायम रहेगा, वहीं देश में स्वेच्छा से उत्सर्जन में कमी के प्रयासों को भी जारी रखेगा। 

क्या भारत के रुख में बदलाव आया है ?
नहीं, भारत ने रुख नहीं बदला है। वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के बयानों के आधार पर कुछ लोगों ने ऐसा मतलब निकाल लिया है जो सरासर गलत है। रमेश ने कहा कि भारत स्वेच्छा से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयास करेगा। रमेश का तात्पर्य यही है कि भारत विश्व मंच पर ग्रीन हाउस गैसों में कमी लाने के लिए कोई कानूनी प्रतिबद्धता स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि देश में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ने दिया जाए। लोगों के स्वास्थ्य को प्रदूषण की भेंट चढ़ने दिया जाए। इसलिए रमेश चाहते हैं कि देश में ग्रीनहाउस गैसों में उत्सर्जन लाने के हमें अपने स्तर पर प्रयास करने चाहिए। वैसे भी यह बात नई नहीं है। 

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पिछली पारी में ही जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए विस्तृत कार्य योजना तैयार कर ली थी। इस पर अब अमल भी शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में शुक्रवार को भारत राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन जैसी महत्वाकांक्षी योजना का श्रीगणेश करने जा रहा है जिसमें 2020 तक 20 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने का लक्ष्य रखा गया है।

बुधवार को भारत ने वायु प्रदूषण के मानकों को यूरोपीय यूनियन की भांति कड़ा बना दिया है। इसके अलावा, एक जनवरी से देश के 11 महानगरों में वाहनों के लिए यूरो-4 मानक लागू हो रहे हैं जबकि बाकी शहरों के लिए यूरो-3 मानक अनिवार्य किए जा रहे हैं। सीएनजी, महानगरों में मेट्रो ट्रेन जैसी योजनाओं का विस्तार, वनों के संरक्षण और विस्तार के लिए सख्त प्रावधान ऐसे कदम हैं जिससे हमारा उत्सर्जन घटेगा।

इससे फायदा क्या है ?
ग्रीन हाउस गैसों में उत्सर्जन में कमी को लेकर जहां नीतिगत स्तर पर पूरी दुनिया में बहस छिड़ी है, वहीं इस सच्चई से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए ये गैसे कितनी खतरनाक हैं। आज कई शहरों में सांस लेना दूभर हो चुका है। फिर अभी तो यह शुरुआत है। अभी हम पूर्ण औद्यौगिक राष्ट्र नहीं हैं। अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो अगले 30-40 सालों में क्या होगा।

अभी हमारी अर्थव्यवस्था प्रगति कर रही है। यदि अभी से भारत लो कार्बन इकोनॉमी की परिकल्पना पर अमल शुरू कर दें तो भविष्य में हमारी स्थिति चीन जैसी नहीं होगी जिसने पिछले कुछ दशकों में औद्यौगिक प्रगति तो की लेकिन उत्सर्जन को लेकर गंभीर नहीं रहा। इसलिए वह आज दुनिया में सबसे बड़े प्रदूषणकारी राष्ट्र के रूप में जाना जाता है। इसलिए स्वेच्छा से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कटौती की घोषणा भारत की पहल दूरगामी है तथा इससे क्लाईमेट चेंज पर स्टैंड बदलने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि यूं कहें कि भारत की यह पहल आगे उसे क्लाईमेट चेंज के खतरों से निपटने के प्रयासों में वैश्विक नेतृत्व प्रदान कर सकती है।

कोपेनहेगेन कांफ्रेस सफल होगी ?
अब जब कुछ ही दिन बाकी बचे हैं तो देखें कि कोपेनहेगन कॉन्फ्रेस को लेकर क्या स्थिति है। एक तरफ तो वे देश हैं जिन पर जलवायु पर्वितन का खतरा मंडरा रहा है। वे चाहते हैं कि अब देर न की जाए। दूसरे भारत जैसे वे देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था प्रगति कर रही है जो भावी जरूरतों के मद्देनजर कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था के पक्षधर तो हैं, लेकिन उनकी अपनी मजबूरियां हैं। उनके समक्ष अपने लोगों की प्रगति के लिए बिना किसी मदद के उत्सर्जन में कमी लाना कठिन है। ये देश चाहते हैं कि धनी देश पहल करें तो वह साथ देंगे।

तीसरी श्रेणी में कम प्रदूषण फैलाने वाले धनी देश हैं जो चाहते हैं कि इस समस्या का हल निकाल लिया जाना चाहिए क्योंकि यदि जलवायु परिवर्तन से पृथ्वी को कोई खतरा पैदा हुआ तो उसकी आंच सभी देशों पर आएगी।

चौथे वे 37 औद्यौगिक राष्ट्र हैं जो सबसे ज्यादा उत्सर्जन कर रहे हैं और इसमें कमी की प्रतिबद्धता लाने की जिम्मेदारियों से बच रहे हैं। इनमें सबसे बड़े प्रदूषणकारी राष्ट्रों चीन, अमेरिका, रूस जैसे राष्ट्रों का रुख साफ नहीं है। इसके बावजूद कोपेनहेगन बैठक से सकारात्मक उम्मीद की जा सकती है। पहले तो यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वहां किसी कानूनी फ्रेमवर्क पर सभी राष्ट्र सहमत हो जाएंगे लेकिन यदि ऐसा नहीं भी हुआ तो इतनी उम्मीद जरूर है कि ग्रीन हाउस गैसों में कमी लाने के लिए सभी देश ऐसी राजनीतिक प्रतिबद्धता दोहराएंगे जो सिर्फ कागजी नहीं होगी बल्कि जिस पर तत्काल अमल करना संभव होगा।

कोपेनहेगेन पर अमेरिकी रुख
चीन के बाद दूसरा बड़ा प्रदूषण फैलाने वाला राष्ट्र अमेरिका अब इस मुद्दे पर विश्व बिरादगी के भारी दबाव में हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए भी यह बड़ी चुनौती है। अभी अमेरिका ग्रीन हाउस गैसों में 30-35 फीसदी तक कटौती के लिए तैयार है, लेकिन इससे काम नहीं चलेगा। वैसे, अमेरिकी संसद में क्लाईमेट चेंज को लेकर जो बिल लंबित है उसमें 2050 तक उत्सर्जन में 80 फीसदी तक की कटौती की बात कही गई है, लेकिन अमेरिका के भीतर इस बिल का विरोध हो रहा है तथा इसका पारित होना आसान नहीं लग रहा है। इसलिए कोपेनहेगन में अमेरिका के लिए मुश्किलें कम नहीं होंगी।

अमेरिका क्योटो प्रोटोकॉल का सदस्य भी अभी तक नहीं बना है। फिर इस बार दबाव सिर्फ विकासशील देशों की तरफ से ही नहीं बल्कि विकसित राष्ट्रों की तरफ से भी पड़ रहा है। धनी देश भी कोपेनहेगन में राजनीतिक समझौते पर सहमति बनाने में जुटे हुए हैं। इसलिए उम्मीद है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए गरीब और विकासशील देशों के लिए बड़ी राशि की मदद की घोषणा कर सकते हैं। वैसे जापान ने इस दिशा में पहल करते हुए इस कार्य के लिए छह करोड़ डॉलर का ऐलान किया है।

धनराशि जुटानी होगी
संयुक्त राष्ट्र क्लाईमेट चेंज सचिवालय के मुताबिक गरीब और विकासशील देशों को मदद के लिए तत्काल 10 अरब डॉलर (करीब 500 अरब रुपये) राशि की जरूरत प्रतिवर्ष होगी। अगले तीन सालों तक इतनी राशि से काम चल जाएगा, लेकिन 2020 में यह बढ़कर 150 अरब डालर (7500 अरब रुपये) प्रतिवर्ष होगी। यह राशि जुटाना तभी संभव है जब धनी देश आगे आएं।

अपनी-अपनी राय
कोपेनहेगन कॉन्फ्रेंस में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को लेकर कानूनी बाध्यता का लक्ष्य नहीं भी हासिल हो पाया तो भी इस सम्मेलन का समापन एक ऐसी डील के साथ होना चाहिए जिसको तत्काल क्रियान्वित किया जा सके। 
बराक ओबामा, राष्ट्रपति अमेरिका

कोपेनहेगन कॉन्फ्रेंस के बाद अगले छह महीने कठिन होंगे क्योंकि असली चुनौती तो कोपेनहेगन के राजनीतिक समझौते को कानूनी संधि का रूप दिया जाना है।
जयराम रमेश, वन एवं पर्यावरण मंत्री

हमें 2010 में अंतर्राष्ट्रीय समझौते के लिए कोपेनहेगन में ग्राउंडवर्क कर लेना चाहिए। क्योटो प्रोटोकाल की जगह लेने के लिए कोपेनहेगन कॉन्फ्रेंस के स्पष्ट लक्ष्य तय कर लेने चाहिए।
एंजिला मार्कल, जर्मन चांसलर

संधि में विलंब नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारे नागरिक जलवायु पर्वितन के खतरों का सामना कर रहे हैं।      
खतरे वाले देश

सार्थक समाधान
संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में 1972 में पहली बार बड़े पैमाने पर बदलती पर्यावरण की स्थिति को लेकर स्टॉकहोम में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। इसके बाद व्यापक स्तर पर इसी विषय को लेकर विचार विमर्श हुआ 1992 में जब रियो द जनेरो में पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में सारी दुनिया में बढ़ते कार्बन उत्सजर्न पर चिंता जाहिर की गई थी।

इसके बाद से लगातार कार्बन उत्सजर्न का दबाव पूरी दुनिया पर बढ़ा, लेकिन इसे कम करने के उपायों को उस पैमाने पर लागू नहीं किया जा सका। इस बार कोपेनहेगन  सम्मेलन में कार्बन उत्सजर्न में कमी लाने का दबाव उस प्रस्ताव के रूप में सामने आने की उम्मीद है जिस पर भारत सहित सभी देशों को दस्तखत करने होंगे।

वैसे मौजूदा आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका प्रति व्यक्ति 24 टन और कनाडा प्रति व्यक्ति 23 टन कार्बन उत्सजिर्त करता है। भारत प्रति व्यक्ति एक टन कार्बन ही उत्सजिर्त करता है। फिर भी यदि कार्बन उत्सजर्न में कमी लाने के अनुबंध पर अमल करना पड़ा तो इसका सीधा मतलब ऊर्जा खपत में कमी लाना ही होगा। ऐसे में विकास की रफ्तार भी मंद पड़ेगी। खासकर विकासशील देशों के सामने नई दिक्कतें खड़ी होंगी।

इसका सरल और सबसे सार्थक उपाय यह है कि उत्पादन और खपत बाजार के बीच की दूरी कम की जाए यानी ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित हो जिसमें माल लाने-ले जाने पर फूंके जाने वाले ईंधन की बचत की जा सके। किसी भी उत्पाद के लिए कच्च माल आसपास ही उपलब्ध हो और तैयार माल भी आसपास खपा दिया जाए तो लागत कम बैठेगी और ईंधन की भारी बचत होगी। अभी तो सबसे ज्यादा कार्बन की उत्पत्ति उपभोक्ता वस्तुओं को एक से दूसरे स्थान ले जाने में ही होती है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:जलवायु परिवर्तन कोपेनहेगन पर टिकी उम्मीदें