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बांग्लादेश के संस्थापक मुजीब हत्याकांड में 12 को सजा-ए-मौत

बांग्लादेश के संस्थापक मुजीब हत्याकांड में 12 को सजा-ए-मौत

बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार के सदस्यों की 34 बरस पहले हुई हत्या के सिलसिले में सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को सेना के पांच पूर्व अधिकारियों की अपील खारिज कर दी और देश से बाहर रहने वाले सात अन्य लोगों की सजा-ए मौत की पुष्टि कर दी।

सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने कड़ी सुरक्षा वाले न्यायालय परिसर में फैसला सुनाया। इसके साथ ही काफी अर्से से लंबित इस भावुक मामले की लंबी कानूनी लड़ाई का समापन हो गया।

'बंगबंधु' के नाम से मशहूर शेख मुजीब उन दिनों बांग्लादेश के राष्ट्रपति थे। पाकिस्तान से अलग मुल्क की स्थापना के लिए शेख मुजीब द्वारा शुरू किए गए आंदोलन के चार साल पूरे होने से पहले ही 15 अगस्त 1975 की सुबह एक विद्रोह में उनकी और परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि 15 अगस्त 1975 का घटनाक्रम साधारण हत्याकांड था और यह किसी विद्रोह का परिणाम नहीं था। स्टार ऑनलाइन के अनुसार, ''आपराधिक साजिश के तहत बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या हुई थी और ऐसा किसी विद्रोह की वजह नहीं हुआ था।''

जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई है उन्हें हत्यारे मेजर कहा गया है क्योंकि उन दिनों उनमें से ज्यादातर जूनियर अधिकारी थी। इनमें लेफ्टिनेंट कर्नल (बर्खास्त) सैयद फारुक-उर रहमान, लेफ्टिनेंट कर्नल (बर्खास्त) सुल्तान शहरयार राशिद खान, लेफ्टिनेंट कर्नल (बर्खास्त) मुहिउद्दीन अहमद, लेफ्टिनेंट कर्नल (बर्खास्त) एकेएम मुहिउद्दीन अहमद, मेजर सेवानिवृत्त बज्लुल होदा, लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) खांडकर अब्दुर राशिद, मेजर (सेवानिवृत्त) शरीफुल हक दालिम, लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) एएम राशिद चौधरी, लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) एसएचएमबी नूर चौधरी, लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त)  मोहम्मद अब्दुल अजीज पाशा, कैप्टन (सेवानिवृत्त) अब्दुल माजिद और रिसालदार (सेवानिवृत्त) मुस्लिमुद्दीन शामिल हैं।

इनमें कुछ ने तो बाद में हत्याएं करने की बात सरेआम कबूली थी और इसे राष्ट्रहित में उठाया गया कदम करार दिया था। इस हत्याकांड में बंगबंधु के परिवार के दो सदस्य ही बचे थे। उनकी बड़ी पुत्री एवं प्रधानमंत्री शेख हसीना ने जनवरी में सत्ता में लौटते ही अदालती कार्रवाई दोबारा शुरू की थी।

हसीना की ओर से इस फैसले पर तत्काल कोई प्रतिनिक्रिया नहीं आई है। उनकी छोटी बहन रेहाना ने कहा है कि महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला बरकरार रखा है। उन्होंने कहा, ''आखिरकार 34 साल बाद मुकदमा समाप्त हो ही गया और इंसाफ हुआ।''

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