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लिबरहान रिपोर्ट पेश होना मुश्किल

लिबरहान रिपोर्ट पेश होना मुश्किल

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के कारणों की जांच करने वाली जस्टिस एमएस लिबरहान कमेटी की रिपोर्ट से सरकार ने कन्नी काट ली है। यह रिपोर्ट संसद के शीतकलीन सत्र में नहीं रखी जाएगी। जस्टिस लिबरहान ने यह रिपोर्ट 30 जून को सरकार को दे दी थी।

जांच आयोग एक्ट के अनुसार रिपोर्ट पेश करने के बाद छह माह के अंदर सरकार को इसे संसद में रखना होता है। छह माह की यह अवधि 30 दिसंबर को पूरी हो रही है। जबकि संसद का शीत कालीन सत्र 21 दिसंबर को समाप्त हो जाएगा।

बुधवार को संवाददाताओं से बात करते हुए संसदीय कार्यमंत्री पीके बंसल ने एक सवाल के जवाब में कहा कि यह रिपोर्ट संसद के इस सत्र में नहीं रखी जा रही है। वह गुरुवार से शुरू होने जा रहे संसद के शीतकालीन सत्र में होने वाले कार्य की जानकारी दे रहे थे। उन्होंने कहा कि उन्हें यह नहीं पता कि कानून के अनुसार रिपोर्ट छह माह में संसद में रखनी होती है। लेकिन जहां तक उन्हें जानकारी है ऐसी रिपोर्ट कार्रवाई रिपोर्ट के(एटीआर) के साथ ही सदन के पटल पर रखी जाती हैं। कार्रवाई रिपोर्ट न आने की वजह से इसे संसद में नहीं रखा जा रहा है।

एक सवाल के जवाब में बंसल ने कहा कि सरकार को राज्यसभा में बहुमत न होने के बावजूद गन्ना मूल्य सहित अनके जटिल मुद्दों से निपटना है। उन्होंने कहा, ‘हम सभी मित्रों का साथ लेने का प्रयास करेंगे। हम इस पर चर्चा के लिए तैयार हैं और उनके विचारों का स्वागत है। विपक्ष से हमारा एक ही अनुरोध होगा कि वे सरकार को सहयोग करें।’

गौरतलब है कि भाजपा ने गन्ना नियंत्रण संशोधन आदेश के सवाल पर सत्र के पहले ही दिन लोकसभा में कार्य स्थगन प्रस्ताव लाने की पहले ही घोषणा कर दी है । यह पूछे जाने पर कि संसद की कार्यसूची में बीमा संशोधन विधेयक, 2009 भी नहीं है। उन्होंने कहा कि यह स्टैंडिंग कमेटी के पास विचाराधीन है।

नए बिल में बीमा एजेंटों की सेवाओं समाप्त करने के प्रावधान हैं। इस प्रावधान का देशभर में तीव्र विरोध हो रहा है। समझा जा रहा है कि इस विरोध को देखते हुए सरकार ने बिल को संसद में पेश नहीं किया है।

संसद का शीतकालीन सत्र :  बंसल ने कहा कि सत्र 19 नंवबर से चालू होकर 21 दिसंबर तक चलेगा जिसमें संसद की 23 बैठकें होंगी। उन्होंने बताया कि शीत कालीन सत्र के लिए 89 मुद्दों को चिन्हित किया गया है। इनमें से 68 नए बिल हैं तथा 13 बिल पुरानें हैं। पुराने बिलों में से छह बिल लोकसभा में लंबित हैं, राज्यसभा में इनकी संख्या 13 है।

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