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आज भी नहीं बदला ग्रैंडपा का अंदाज

आज भी नहीं बदला ग्रैंडपा का अंदाज

मैंने कई साल उन्हें टीवी पर खेलते देखा। उन्हें देखते-देखते मेरे मन ने भी कहा, ‘मुझे भी उन जैसा क्रिकेटर बनना है।’ हां, यह सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके साथ खेलने का मौका भी मिलेगा। अब करीब दस साल हो गए हैं उनके साथ खेलते हुए। 1992 में जब उन्हें पहली बार टीवी पर खेलते देखा, तब मैं सातवीं में पढ़ता था। उस दिन मेरी परीक्षा थी। मैं स्कूल नहीं गया और उनकी बैटिंग देखने के लिए घर पर ही रुक गया। टीवी पर देखते-देखते वे जो भी शॉट खेलते मैं उनकी कॉपी करने की कोशिश करता।
 
कुछ साल बाद मैं भारतीय टीम में आ गया। श्रीलंका में त्रिकोणीय सीरीज में मैंने पहला शतक लगाया था। उस टीम में सचिन नहीं थे। होटल पहुंचा, तो मुझे एक फैक्स मैसेज मिला। यह किसी और का नहीं, बल्कि खुद सचिन का ही मैसेज था। उन्होंनें लिखा था, ‘आपकी इस पारी ने मुझे अपनी बैटिंग की याद दिला दी।’ अपने आइडियल, अपने गुरु का यह मैसेज देख कर मेरी खुशी दुगुनी हो गई। मेरे लिए इससे बड़ा कॉम्प्लीमेंट और क्या हो सकता था?

सचिन को खेलते हुए दो दशक हो गए हैं। मुझे नहीं लगता कि भविष्य में इतना लम्बा कोई और खेलेगा। वे भारत को 2011 का विश्व कप जिताएं और आगे भी खेलें। यही मेरी दुआ है। क्रिकेट के लिए उनका लगाव ही उन्हें बार-बार प्रेरित करता है। यही कारण है कि हर बार चोट से उबरने के बाद उन्होंने धमाकेदार वापसी की है।

जब सचिन ड्रेसिंग रूम में होते हैं, उस समय हम सब बहुत रिलेक्स होते हैं। इसका कारण है सामने जो भी टीम होती है, वह उन्हीं के बारे में प्लानिंग करती रहती है। जब सचिन दूसरे छोर पर होते हैं, तो भी बॉलर उन्हीं को आउट करने के बारे में सोचता रहता है। इसलिए हम रिलेक्स होकर खेलते हैं।

अब हम उन्हें ग्रैंडपा कहने लगे हैं। हैदराबाद में उनकी 175 रन की पारी ने दिखा दिया कि बेशक उनकी उम्र बढ़ गई है, लेकिन उनका क्रिकेट खेलने का अंदाज और चेहरे की मुस्कुराहट आज भी वही है। क्रिकेट को उन्होंने जो भी दिया है उसके लिए अगर सरकार उन्हें भारत-रत्न से सम्मानित करे तो मेरे साथ-साथ देशवासियों को भी बहुत खुशी होगी।

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