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दो टूक (19 नवम्बर, 2009)

राजधानी की इस बेबसी को कोई क्या कहे! हम अत्याधुनिक मेट्रो चला सकते हैं। शानदार फ्लाईओवर बना सकते हैं। कॉमनवेल्थ खेल जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन भी कर सकते हैं। हम सब कुछ कर सकते हैं बस ट्रैफिक जाम का कोई इलाज नहीं कर सकते। आत्मा की तरह जाम भी मानो अजर-अमर है।

ट्रेड फेयर समाज की जरूरत होते हैं। धरना-प्रदर्शन भी लोकतंत्र का हिस्सा हैं। दुनिया भर में व्यापार मेले लगते हैं। वहां भी रैलियां होती हैं लेकिन हमारी दिल्ली ही क्यों कोई गन्ना रैली नहीं झेल पाती? हर साल नवंबर में प्रगति मैदान हमें डराने क्यों लगता है? चीन ने ओलंपिक के कई बरस पहले ही सुचारु यातायात के इंतजाम कर लिए थे। लेकिन हमारा क्या हाल है। अब जब कॉमनवेल्थ गेम्स में कुछ महीनों का फासला बचा है, हमारी सड़कें क्यों हमें धोखा दे रही हैं?

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  • Web Title:दो टूक (19 नवम्बर, 2009)