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सलाह सबसे पर फैसले खुद लेती थीं वे

मेरा यह बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मुझे एक लंबे अरसे यानी 22 साल तक इंदिरा जी की सेवा करने का अवसर मिला। इस दौरान इंदिरा जी ने अपने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे और मुझे भी उनका सामना करना पड़ा। मेरे विचार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, चाहे वह राजनीति से हो, प्रशासनिक प्रणाली से हो या बिजनेस के क्षेत्र से जिसको उनके साथ बिना किसी रुकावट के काम करने का उतना अवसर मिला हो, जितना कि मुङो मिला। इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि उनकी उपलब्धियों के बारे में बात की जाए तो वह शायद इतिहास बन जाए। उनमें से कुछ मुख्य आज भी हमारे सामने हैं। 

जब उन्होंने पहली बार सत्ता संभाली तो देश में खाद्य पदार्थो की भारी कमी थी। देश को अमेरिका से अनाज तक की मदद लेनी पड़ती थी। देश पर घोर आर्थिक संकट था। उन्होंने हरित क्रांति की शुरुआत की। आर्थिक संकटों को दूर करने का अभियान शुरू किया। लाखों शरणार्थियों के रूप में बांग्लादेश का संकट सामने आया। पाकिस्तान से युद्ध हुआ और बांग्लादेश की स्थापना हुई। उन्होंने इसके बाद गरीबी हटाने का आंदोलन छेड़ा। अपने अभियान की कामयाबी के लिए मध्यावधि चुनाव कराने पड़े।  

इंदिरा जी द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण, सार्वजनिक क्षेत्रों को बढ़ावा और प्रीवीपर्स के खात्मे जैसे फैसले जिन नेताओं को पसंद नहीं थे, उन्होंने देश को नारा दिया- इंदिरा हटाओ, लेकिन इंदिरा जी का नारा था - देश बचाओ, गरीबी हटाओ। नतीजतन सन् 71 के चुनाव में आम जनता ने कांग्रेस का साथ दिया। इसके बाद भी सिंडीकेट नेताओं ने अपनी मुखालफत जारी रखी, उन्हें पार्टी से निकाल दिया। तब ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्यों ने दिल्ली में एक अधिवेशन किया और इंदिराजी को नेतृत्व सौंपते हुए कांग्रेस (आई) बना ली।

इसके बावजूद कोई ऐसा दिन नहीं था, जब नए प्रतिद्वंद्वियों का सामना न करना पड़ा हो। जब वे चुनाव में नहीं हरा पाए तो दूसरे तरीकों से झूठे आरोप- लांछन लगाने की होड़ शुरू कर दी। देश में कई प्रकार से उपद्रव मचाने शुरू कर दिए। रेलवे स्ट्राइक तक का ऐलान कर दिया गया, जिसका इंदिरा सरकार ने डटकर मुकाबला किया।

इसी बीच इलाहबाद हाईकोर्ट का जजमेंट आ गया। इस पर इंदिरा जी के इस्तीफे की मांग हुई पर यह मांग करने वाले भूल गए कि जिस जज ने यह जजमेंट दिया उसी जज ने उसी समय इसके अमल पर स्टे भी दिया था, ताकि वे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें। यहां तक कि पुलिस और सुरक्षा बलों तक का आह्वान किया गया कि वह सरकार के फैसलों को न मानें। देश में तब 1974 में हर क्षेत्र में विपक्षियों द्वारा अराजकता फैलाने का प्रयास हो रहा था, स्थितियां गंभीर थी।

तब इंदिराजी कोई ठोस कदम उठाने की सोच रही थी ताकि विपक्षी अभियान के ऊपर नियंत्रण रखा जा सके। लेकिन किस प्रकार के कदम उठाए जाएं इसका फैसला नहीं हो पा रहा था। और जब इमरजेंसी लगाई गई तो सारे देश ने उसका स्वागत किया था। थोड़े समय बाद कुछ लोगों ने निजी बदले लेने के लिए इसका दुरुपयोग किया तो कुछ झूठी अफवाहें भी फैलाई गईं। कितना भारी दुष्प्रचार का अभियान था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि परिवार नियोजन कार्यक्रम को जबरन लागू करने में हुई कथित जोर-जबरदस्ती की सार्वजनिक जांच में लोगों से सहयोग मांगा गया तो पूरे देश से मात्र पांच हजार ही पत्र आए। उनमें से भी किसी ने मांगने के बावजूद जोर-जबरदस्ती का सुबूत नहीं दिया।

दुष्प्रचार कुछ भी हो, लेकिन सच यह है कि संजय गांधी का उत्थान भी कोई बड़ी तेजी से नहीं हुआ था। 1972 में जब 16 राज्यों में पार्टी चुनाव जीती तब भी पार्टीजनों की लगातार मांग के बावजूद 1975 तक वे ज्यादा सक्रिय नहीं थे। लेकिन यह सच है कि इमरजेंसी के दौरान कुछ स्वार्थी लोगों ने उन्हें आगे बढ़ाया परंतु तब भी उन पर इंदिराजी का पूरा नियंत्रण रहा। दुर्घटना में संजय की मृत्यु के बाद कांगेसजन चाहते थे कि राजीव गांधी राजनीति में सक्रिय हों पर उनकी राजनीति में कोई रुचि नहीं थी। न ही वे किसी राज-काज में दखल देते थे। जब पार्टीजनों ने ज्यादा दबाव बनाया तो वे चुनाव लड़कर और जीतकर राजनीति में आगे आए। लेकिन, संजय हों या राजीव गांधी रहे हों और राहुल गांधी ही क्यों न हों, इस परिवार के सदस्यों का दृष्टिकोण एक ही रहा है। फिर भी किसी के बारे में लिखना हो तो उस समय की  परिस्थितियों और वातावरण को ध्यान में रखते हुए ही फैसले होते हैं। इसलिए उस समय की इंदिराजी की नीतियों से आज की परिस्थितियों की तुलना करना ठीक नहीं होगा।

इंदिरा जी की कुछ बातें खास थी। पहली यह कि इंदिराजी देश की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता हर कीमत पर बनाए रखने की पक्षधर थीं। वे गरीबी दूर करने, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, हरिजनों आदिवासियों के कल्याण के कदम उठाने पर जोर देती थीं और आज की कांग्रेस सरकार भी उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रही है। मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के प्रति कांग्रेस की आइडियोलॉजी में कोई फर्क नहीं पड़ा है। इन नीतियों के साथ समाज के विभिन्न वर्गो का समर्थन आज भी है।

आर्थिक नीतियों की बात करें तो पूरी दुनिया के हालात बदले हैं और उसी के मुताबिक नीतियां भी। इंदिराजी के दौर में जैसी परिस्थितियां थीं उसके अनुसार मेरी नजर में उन्होंने बहुत बेहतर काम किए। उनकी सोच में सच्ची मानवीयता का परम गुण था। वे बहुत सोच-समझकर और सबसे सलाह मशविरा करके कोई भी फैसला लेती थीं लेकिन यह सच है कि अंत में वह फैसला उनका अपना ही होता था। उनका अपने मुल्क और यहां के लोगों के प्रति असीम लगाव था। राष्ट्रीयता की भावना उनमें कूट-कूटकर भरी थीं। उनके मन में गरीबों के प्रति कुछ करते रहने का जज्बा था। वे देश के लोगों का जीवन स्तर बेहतर करना चाहती थी और इसी दिशा में कार्य भी करती थीं। वे हिन्दुस्तान का परचम दुनिया में सबसे ऊंचाई पर फहराते देखना चाहती थीं। इस देश के प्रति ईमानदारी, वफादारी और समर्पण भावना की मिसाल वे खुद थीं। यह ऐसी चीज है जिसकी परिभाषा शब्दों में नहीं की जा सकती। इंदिरा गांधी इस बात का प्रतीक हैं कि अपनी लॉयल्टी को खुद के कार्यकलापों से ही निखारा जा सकता है।

लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं, वे इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे हैं
(प्रस्तुति - प्रदीप संगम)

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