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संगीत में अध्यात्म

आध्यात्मिक प्रेरणा तथा ईश्वरभक्ति के साथ-साथ प्रभात संगीत सामाजिक पुनर्जागरण का भी संदेश देता है। भाव, भाषा, छन्द और सुर की दृष्टि से यह एक अन्यतम संगीत है। इन गीतों का आवेदन सार्वजनिक है, जो मनुष्य को जीवन, जगत और जगदीश्वर के संबंध में एक नूतन चेतना देता है। जाति, धर्म और भाषा का अतिक्रमण करके प्राच्य और पाश्चात्य जगत के अनेक लोगों ने इस संगीत को अपनाया है।

प्रभात संगीत हमारे अंदर आत्म-निवेदन और पूर्ण समर्पण की भावना को उजागर करता है। अपने प्रभात संगीत के माध्यम से भक्ति तत्व काव्य रचना के बंधनों को श्री आनन्दमूर्ति सामाजिक और आध्यात्मिक समर्पण के उच्च स्तर तक ले जाते हैं। इसका लक्ष्य भक्ति काव्य भी था और इसके साथ ही सामाजिक जागरण भी। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से हमशा ही यह कहा कि मानव जीवन एक आध्यात्मिक धारा का प्रवाह है। जागतिक दायित्व पालन करते हुए हर जीव को शिव में प्रतिष्ठित होना है। समाज और संसार की सेवा करने के साथ ही अपने जीवन में सभी को मुक्ति-मोक्ष की चेष्टा भी करनी है। हम जिस राह पर आगे बढ़ रहे हों वहां हमें एक दूसरे के प्रति सहायता का हाथ बढ़ाने होंगे। इसलिए भी कि सभी एक दूसरे के आत्मीय हैं।

एक बांग्ला ‘भक्ति गीत’ के गीतकार ने इस रूप में अभिव्यक्त किया है - ‘तुमि आमार ध्यान, तुमि आमार ज्ञान। तुमि आमार संसार। तोमाय हारिये काँदि, तोमाय फिरिये हाँसी, तुमि मोर जीवनेर सार’।

हे प्रभु तुम ही मेरा ध्यान हो, तुम ही मेरा ज्ञान हो और तुम ही मेरा संसार हो। हे मेरे जीवन के सार तत्व तुम्हें खोकर मैं रोता हूँ और तुम्हें वापस पाकर हँसता हूँ। भक्ति गीत अगर आध्यात्मिक भाव से पूर्ण हो तो उसके लिए भाषा कोई बंधन नहीं रहता। वास्वत में प्रभात संगीत मनुष्य को अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा के रूप में मदद करता है।

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