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अस्पतालों की छत

दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में छत का एक टुकड़ा टूट कर एक मरीज पर जा गिरा जो टाइफाइड का इलाज करवाने वहां आई थी। इससे टाइफाइड के बैक्टीरिया तो जख्मी नहीं हुए, लेकिन वह महिला मरीज जरूर जख्मी हो गई। अब हो सकता है कि उसे मेडिकल वार्ड से सर्जिकल वार्ड में भेज दिया गया हो। दरअसल हमारे अस्पताल बड़े पैमाने पर एक्सजेंस प्रोग्राम चलाते हैं, टाइफाइड के मरीज के हाथ पैर टूट सकते हैं, कोई दुर्घटना का इलाज करवाने अस्पताल में भर्ती हुआ हो तो वह आखिरकार जिगर की किसी बीमारी का शिकार होकर इलाज करवाता मिल सकता है।

कोई स्वाइन फ्लू के लिए भर्ती हो और उसे अस्पताल में आकर कुत्ता काट सकता है, सो वह कुत्ता काटे का इलाज करवाने लगता है। इलेक्ट्रिक शॉक लगने की घटनाएं इतनी मामूली हैं कि उन्हें आम मान लिया गया है। अस्पतालों में इसके अलावा शादियां तय होती हैं, भावी पीढ़ी की नींव रखी जाती है, चोरी-चमारी, डाके वगैरा आम हैं। आगजनी की घटनाएं भी होती ही रहती हैं। छत गिरने की घटनाएं भी पहली बार नहीं हुई हैं, हां, कभी-कभी दीवार भी गिरी है और कभी-कभी पूरा कमरा ही भहरा कर गिरा है। 

अस्पतालों में अक्सर नलों में पानी नहीं रहता और कभी-कभी बाढ़ आने का खतरा भी होता है। इन सभी कार्यक्रमों में विभिन्न बीमारियों का उदारता से आदान-प्रदान होता है। बल्कि हमारे सरकारी अस्पताल इलाज से ज्यादा बीमारियों के बैक्टीरिया, वायरस के मिलने-जुलने के ठिकाने हैं? प्राइवेट अस्पताल ऐसे नहीं हैं, वहां मुफ्त में तो इन्फेक्शन भी नहीं मिलते, लेकिन वे मरीज के बिल में उन बैक्टीरिया, वायरस का खर्च जोड़ लेते हैं, जो मरीज अस्पतालों से घर ले जाते हैं। इसलिए हम मेडिकल टूरिज्म में एक नया सेल जोड़ सकते हैं। ऐसा क्यों हो कि मेडिकल टूरिज्म का अर्थ यही हो कि विदेशों से मरीज इलाज करवाने भारत आएं।

इससे ज्यादा रोचक यह होगा कि हम विदेशी मेहमानों को भारत के अस्पतालों का दौरा करवाएं। इसे चाहे तो हम मेडिकल टूरिज्म कह सकते हैं या एडवेंचर स्पोर्ट्स के खाते में भी डाल सकते हैं। विदेशों से आए मेहमान ऐसे अस्पतालों को देखकर बेहद खुश होंगे, जहां छतें गिरती हैं, पानी नलों में तो नहीं आता, लेकिन दीवारों से रिसता है। हर कदम पर चोर-डाकू-लूटेरे हैं, बैक्टीरिया और वायरसों का मित्र मिलन कार्यक्रम चल रहा हो और इन सबसे बेपरवाह डॉक्टर और मरीज अपने-अपने काम में लगे हैं। इसके बावजूद इस सब में से भी कुछ मरीज ठीक होकर बाहर निकलते हैं और डॉक्टर सब कुछ छोड़कर हिमालय में नहीं चले जाते।

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