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चीन की भूमिका

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीनी राष्ट्रपति हू शिन्ताओ ने भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में बीजिंग में जो साझा बयान दिया है उससे भारत के राजनयिक विशेषज्ञों के कान खड़े हो गए हैं। भारतीय प्रधानमंत्री के अमेरिका दौरे के ठीक पहले दिए गए इस बयान ने एक तरफ भारतीय विदेश मंत्रालय के उत्साह में कुछ डिग्री की कमी की है वहीं 1998 में परमाणु परीक्षण के ठीक बाद बिल क्लिंटन और जियांग जेमिन की तरफ से दिए गए दोनों देशों को डांटने वाले बयानों की याद दिला दी है।

उस समय भारत ने उसके जवाब में बयान जारी किए थे, अब देखना यह है कि भारत इस साझा बयान को बेअसर अपनी चुप्पी से करता है किसी बयान से। ऊपर से देखने पर सद्भावपूर्ण लगने वाले इस संयुक्त बयान से यह ध्वनि निकल रही है जैसे अमेरिका भारत और पाकिस्तान के बीच चीन को मध्यस्थ बनाना चाहता है। भारत को यह मध्यस्थता स्वीकार्य तो है ही नहीं बल्कि इसका जिक्र भी उसके लिए अखरने वाला है। 

यह बात भारत ही नहीं अमेरिका भी अच्छी तरह से जानता है कि पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को सफल बनाने में चीन के परमाणु प्रसार की बड़ी भूमिका रही है। हाल में भी अरुणाचल प्रदेश पर दावे को लेकर चीन की हरकतें भारत को परेशान करने वाली रही हैं। पिछले साल मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भी चीन के प्रतिनिधि ने भारत और पाक के संबंधों में तनाव कम करने का प्रयास भी किया था।
   
भारत की नजर में चीन की विदेश नीति पाकिस्तान की तरफ झुकी हुई है। दक्षिण एशिया के इसी असंतुलन को दूर करने के लिए भारत अमेरिका का रणनीतिक भागीदार बना है और उसे अमेरिका से अपने पक्ष की बातें किए जाने की उम्मीद बनती है। भारत यह भी चाहता है कि मंदी के दौर में भी उसने जिस आर्थिक क्षमता का परिचय दिया है और अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को जिस तरह अक्षुण्ण बनाए रखा है उसका भी महत्व उसे मिले।

पिछले 25 सालों से भारत आतंकवाद से कठिन संघर्ष कर रहा है उसमें भी वह दुनिया से सहयोग चाहता है। भारत की इस वाजिब उम्मीदों के बावजूद उसे अमेरिकी विदेश नीति की सामयिक जरूरतों को समझना होगा। अमेरिका को अफगानिस्तान, ईरान और उत्तर कोरिया में ही नहीं पाकिस्तान में भी अपनी कामयाबी के लिए चीन का सहयोग चाहिए। इसलिए भारत को तीव्र प्रतिक्रिया जताने के बजाय अपनी विदेश नीति के लिए मजबूती से राह बनानी चाहिए।

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