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विदेशी पैसे की बाढ़

पिछले एक साल में भारतीय शेयर बाजार में लगभग 71,000 करोड़ रुपए का विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) हुआ है। जितना इसके पहले कभी नहीं हुआ था। पैसा कहीं से भी आए, अच्छा ही लगता है और यह पैसा भी हमारी अर्थव्यवस्था की बेहतरी की ओर ही संकेत करता है, लेकिन इस पैसे के कुछ खतरे भी हैं। वित्तमंत्री का कहना है कि फिलहाल खतरे की कोई बात नहीं है और जरूरी हुआ तो सही वक्त पर सरकार कदम उठाएगी।

यह पैसा इतने बड़े पैमाने पर आ इसलिए रहा है क्योंकि पश्चिमी देशों में मंदी से राहत के लिए जो पैकेज दिए गए हैं, उनकी वजह से बाजार में नकदी बहुत आ गई है। इस पैसे पर पश्चिमी देशों में कमाई खास नहीं हो सकती, शेयर बाजार अभी बुरी हालत में हैं। अमेरिका में ब्याज दर लगभग 0.25 प्रतिशत यानी नगण्य है। भारतीय अर्थव्यवस्था में पैसा लगाने पर मुनाफा बहुत ज्यादा है, इसलिए पैसा इधर खिंचता चला आ रहा है और आगे भी इसकी रफ्तार तेज ही रहेगी। इतना पैसा शेयर बाजार में आने से शेयर बाजार तो सुधरेगा, लेकिन वास्तविक अर्थव्यवस्था में इसकी भागीदारी उतनी बड़ी नहीं होती। 

इससे दो खतरे हैं, पहला यह है कि इतना सारा पैसा आने से मुद्रास्फीति बढ़ेगी, इसका खतरा यह है कि इससे रुपये की कीमत बढ़ रही है और निर्यात पर इसका बुरा असर पड़ेगा। मुद्रास्फीति आने वाले दिनों में तेजी से बढ़ सकती है, विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि अगले मार्च-अप्रैल तक मुद्रास्फीति 5% तक होगी। दूसरी दिक्कत यह है कि निर्यात क्षेत्र विश्वव्यापी मंदी की वजह से वैसे ही चौपट है और रुपये की बढ़ी कीमत उसे और कठिनाई में डाल सकती है।

निर्यात एक ऐसा क्षेत्र है, जिस पर मंदी की सबसे ज्यादा मार पड़ी है और जिसकी स्थिति का सुधरना पश्चिमी देशों के मंदी से उवरने से जुड़ा है। निर्यात क्षेत्र को संभालने के लिए अभी काफी वक्त चाहिए होगा और तब उसे रुपये की बढ़ती कीमत की मार से बचाना होगा। फिलहाल वित्तमंत्री की बात सही है कि खतरे की बात नहीं है, लेकिन दो-एक महीने में हमें पैसे के दुष्प्रभावों से अर्थव्यवस्था को बचाने के उपाय शुरू करने ही होंगे और इस बात के संकेत भी हैं कि वित्तमंत्रालय और रिजर्व बैंक इसके लिए तैयार हैं।

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