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जिसने चुना उसी को धुना

देश में दो बड़े राष्ट्रीय दल हैं- भाजपा और कांग्रेस। बाकी सब क्षेत्रीय दल ही हैं। जनता उन्हें इस विश्वास से वोट देती है कि वे सरकार बनाएंगे और जनता की सेवा करेंगे। लेकिन अब तक देश में ऐसा नहीं हुआ। जिन गरीब और कमजोर वर्गो के बल पर ये दल सत्तासीन होते हैं उस पर कभी ध्यान नहीं देते। मौजूदा सरकार भी इसी तरह मंहगाई को बढ़ावा दे रही है।
श्रीकांत चौबे, वाराणसी

नेत्रहीन छात्रों को वजीफे मिले
पहले नेत्रहीन छात्रों के सरकार की तरफ से 6,600 रुपये की जो सालाना स्कॉलरशिप मिलती थी, अब वह नहीं मिल पा रही। जिसकी वजह से इस महंगाई के दौर में नेत्रहीनों की स्थिति सबसे शोचनीय हो गई है। सरकार से अनुरोध है कि वह बंद स्कॉलरशिप फिर से शुरू करे।
मीन सतीश सोलंकी, यमुना विहार, नई दिल्ली

ट्रेड फेयर का डर
हर साल जब दिल्ली में ट्रेड फेयर लगता है तो इसे देखने का मन भी करता है और कठिनाइयों को ध्यान आते ही पैर कांपने लगते हैं। पहले तो टिकट के लिए लंबी लाइन लगनी पड़ती है और फिर अंदर की भीड़। कई बार तो भीड़ इतनी होती है कि प्रवेश द्वार से निकास द्वार तक की यात्रा करने के बाद भी समझ नहीं आता कि इस पवेलियन में है क्या। मेले के आयोजकों और प्रबंधकों को इस तरह की परेशानियों से बचाने की व्यवस्था करनी चाहिए।
गुप्ता दाढ़ी वाला, सदर बाजार, दिल्ली

गाँव में चाहिए सड़क
ग्रामीणों की समस्या का अगर हम समाधान करना चाहते हैं तो इसके लिए बस एक ही काम करने की जरूरत है कि गांवों को पक्की सड़कों से जोड़ दिया जाए। इससे शासन, प्रशासन, पुलिस डौक्टर, मास्टर, शिक्षा स्वास्थ खुद वहां तक जा सकेगा। एनजीओ भी ऐसे ही गांवों में जाते हैं।
राज यायावर, बोध गया

राहुल का एक अच्छा फैसला
हाल ही में राहुल गांधी का एक वक्तव्य आया कि शायद योजनाओं का पांच पैसा ही जरूरतमंदों तक पहुंच पाता है, लेकिन उनको इनके कारणों तथा ठोस समाधानों को ढूंढ़ने की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहिए। इसलिए देश आज उनसे राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने की आशा रखता है। इसलिए राहुल देशव्यापी यात्राओं के दौरान छुटभैया नेताओं से दूर रहकर जनता से सीधा संपर्क कर रहे हैं। यह उनका अच्छा फैसला है। जाहिर है आज देश को अनुदान का निवाला नहीं बल्कि एक प्रभावी राजनेता की जरूरत है, जो राष्ट्रीय स्वाभिमान जगा सके, लोगों को प्रेरित कर सकेव  उनमें आगे बढ़कर आत्मनिर्भर बनाने का जज्बा उत्पन्न कर सके।
शंकर प्रसाद तिवारी, गुप्तकाशी

यहां-वहां, जहां-तहां
जहां-जहां लगता है
सरकारी प्रगति योजना का
बहुरंगी पोस्टर
वहीं-वहीं खुदी सड़क, टूटा पुल,
नदारद नाली का गटर
गफूर स्नेही, उज्जैन

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