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हाइपोथायरॉइडिज्म

इस अवस्था में थायराइड ग्रंथि द्वारा श्रवित होने वाले हारमोन्स की मात्र अल्प या अनुपस्थित हो जाती है। इस रोग में कमजोरी, सुस्ती एवं भावशून्यता देखने में आती है। इसका प्रमुख लक्षण पाचन की मंदता है-शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं का धीमापन, कब्ज, कमजोरी, थकावट, पेशियों में दर्द, बहरापन, भूख न लगना, वजन वृद्धि, स्मृति क्षीणता एवं मासिक धर्म की अनियमितताएं आदि हैं।

थायराइड ग्रंथि से संबंधित सभी समस्याओं का समाधान योग द्वारा संभव है किंतु यौगिक प्रक्रिया का परिणाम प्राप्त करने में थोड़ा समय लगता है, इसलिए रोगी को योग के साथ-साथ दवाइयों का भी सेवन करना चाहिए।

आसन : थायराइड ग्रंथि को स्वस्थ रखने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण आसन हैं-सर्वागासन, विपरीतकरणी, हलासन तथा मत्स्यासन आदि। इसके साथ-पवनमुक्तासन, सूर्य नमस्कार, सुप्त वज्रासन, धनुरासन, भुजंगासन, ग्रीवासन एवं सिंहासन आदि भी उपयोगी हैं। यहां पर सुप्त वज्रासन की विधि प्रस्तुत है-

घुटने के बल जमीन पर बैठ जाएं। दोनों हाथों को नितम्ब के पीछे जमीन पर ले जाइए। इसके पश्चात् धीरे-धीरे हाथों को कुहनी से मुड़ते हुए पीछे की ओर झुकते जाइए। अंतिम अवस्था में पूरा धड़ पीछे जमीन पर आ जाता है। इस अवस्था में आरामदायक अवधि तक रुकें, फिर पूर्व स्थिति में आएं।

प्राणायाम : थायराइड रोगों में सबसे प्रभावी प्राणायाम है-उज्जायी। खेचरी मुद्रा के साथ उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास बहुत उपयोगी सिद्ध होता है।

मुद्रा एवं बंध : जालंधर बंध, महाबंध, महामुद्रा तथा पाशिनी मुद्रा इस समस्या में उपयोगी हैं।

शिथिलीकरण : योगनिद्रा एवं शवासन का नियमित अभ्यास इस समस्या का स्थायी निदान करता है। ध्यान का नियमित अभ्यास करें।

आहार : शाकाहारी तथा प्राकृतिक आहार लें।

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