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हमारे दौर के प्रतीक हैं सचिन

खेल की दुनिया में बीस साल बहुत होते हैं। जहां सेकंड के सौवें हिस्से में इतिहास बन बिगड़ जाता है, वहां बीस साल एक युग होते हैं। पिछले बीस साल का युग सचिन तेंदुलकर का युग है। हमारे यहां इतिहास प्रतिभाओं के असमय नष्ट होने का है, सुविधाओं या अवसरों के अभाव में या इनकी बहुतायत से भी प्रतिभाएं असमय नष्ट हुई हैं, लेकिन सचिन इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि बीस साल पहले उनसे जो उम्मीदें थीं, उनसे ज्यादा ही उपलब्धियां उनकी हैं। उसके बाद का युग संभावनाओं के उपलब्धियों में बदलने का युग कहा जा सकता है।

मुंबई में उसके पहले भी एक बल्लेबाज था, जिसकी चर्चा विश्वविद्यालयीन क्रिकेट से ही शुरू हो गई थी। यह बल्लेबाज यानी सुनील गावसकर से लगभग सीधे ही वे वेस्टइंडीज के दौरे पर गए और उसके बाद अपने दौरे के सबसे बड़े ओपनिंग बैट्समैन बने। गावसकर का युग तब शुरू हुआ था, जब स्वतंत्र भारत शुरुआती झटकों के बाद आत्मविश्वास महसूस कर रहा था। चीन का आक्रमण पुराना हो चुका था, पाकिस्तान को जवाब दिया जा चुका था, हरित क्रांति ने अकाल और अन्नाभाव का दौर खत्म कर दिया था। भारत न्यूजीलैंड से न्यूजीलैंड में एक सीरीज जीत चुका था, भारत के पहले मध्यमवर्गीय आर्थिक स्थिति वाले कप्तान अजित वाडेकर बागडोर संभाल चुके थे।
गावसकर के युग में भारत लगातार जीतने वाली तो नहीं, लेकिन ऐसी टीम बनी जिसको हराना मुश्किल हो गया। गावसकर खिलाड़ियों की सुविधा और पैसों के लिए बोर्ड से लड़े, उन्होंने यह साबित किया कि भारतीय बल्लेबाज तेज गेंदबाजी का मुकाबला कर सकते हैं। उन्होंने वह जमीन तैयार की, जिसमें कपिलदेव की आक्रामकता के लिए सही माहौल था। कपिलदेव ने पहली बार तेज गेंदबाजी को भारत का हथियार बनाया और उनके जमाने में क्रिकेट ऐसा खेल बना जिसमें ग्लैमर था और पैसा भी।

सचिन मुंबई की परंपरा और अनुशासन से आए थे, लेकिन उनमें आक्रामकता कपिलदेव की थी। मुंबई के क्रिकेट में ‘खड़ूस’ एक सम्मानजनक शब्द है। मुंबई की बल्लेबाजी ‘खडूस’ बल्लेबाजी रही है। तकनीकी रूप से सही, निहायत सुरक्षित अंदाज में खेलना मुंबई की विशेषता थी। हवा में शॉट खेलना एकदम निषिद्ध था, संदीप पाटिल जैसे बल्लेबाज के लिए भी। सामने वाली टीम को जरा भी मौका दिए बिना धीमे-धीमे उसे रनों के पहाड़ के नीचे दबा देना ही मुंबई की ‘खडूस’ बल्लेबाजी थी। लेकिन सचिन की प्रतिभा के आगे इस परंपरा की नहीं चली।

इस स्कूल के किशोर के आगे बड़े-बड़े धुरंधर हवा में शॉट न खेलने की हिदायत नहीं दोहरा सके। सचिन शुरू से ही अपनी लहर में खेलते थे। अगर गेंदबाज चुनौती दे तो लगातार चार चौके मार सकते थे या किसी दिन सोच कर आएं तो आशीष कपूर जैसे ऑफ स्पिनर पर सिर्फ ‘इनसाइड आउट’ शॉट खेल सकते थे। लेकिन प्रतिभा के इस विस्फोट को रोकने की हिम्मत किसी में नहीं थी।

सचिन ने मुंबई के क्रिकेट का अनुशासन और लगन तो अपनाया, लेकिन उसका शास्त्रीय सांचा तोड़ डाला। इस क्रम में उन्होंने क्रिकेट को देश के गांव, कस्बों शहर के बच्चों, किशोरों और नौजवानों के लिए आत्मीय और निकट बना डाला। अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी क्रिकेट ऐसा खेल नहीं था, जिसे सिर्फ महानगरों के सुविधासंपन्न मैदानों पर सीखा जा सकता था और कस्बाई नौजवान या तो सिर्फ उसकी कमेंटरी सुन सकते थे या अपने धूल भरे मैदानों पर घरेलू मैच खेल सकते थे।

सचिन के युग ने क्रिकेट को भारतीय नौजवान की ऊर्जा और महत्वाकांक्षा की अभिव्यक्ति और प्रतीक बनाया। कस्बे का क्रिकेटर भी यह सोचने लगा कि अगर सचिन, वसीम अकरम की ऑफ स्टंप के बाहर की गेंद को ऑन पर पुल कर सकते हैं तो मैं भी क्यों नहीं कर सकता। यह दौर केबल टीवी और इंटरनेट के आगमन का दौर था, जिसमें दूरियां घट रही थीं। टेस्ट मैच और वन डे मैच हर घर के ड्राइंगरूम में देखे जा सकते थे। यह संयोग है या और कुछ और कि केबल टीवी के युग के पहले लोकप्रिय क्रिकेटर ही नहीं, बल्कि सबसे बड़े स्टॉर भी सचिन तेंदुलकर थे।

सचिन भले ही मुंबई के मध्यमवर्गीय परिवार से आए, लेकिन उनके पीछे आने वालों में वीरेन्द्र सहवाग, जहीर खान, मुनफ पटेल, प्रवीण कुमार, एम. श्रीसंत और ऐसे तमाम खिलाड़ी हैं, जो क्रिकेट के परंपरागत केंद्रों से नहीं आए। इन सभी खिलाड़ियों ने मेहनत की है, इनमें लगन है, लेकिन इनमें भरपूर विविधता है, क्योंकि क्रिकेट को उन्होंने स्वाभाविक अभिव्यक्ति की तरह अपनाया, किसी कोचिंग कैंप में सिखाए खेल की तरह नहीं। लेकिन अपने बीस साल के करियर में सचिन ने आगे की राह भी दिखाई, जिस तरह उन्होंने अपनी चोटों से उबरने में मेहनत और लगन दिखाई, उम्र के साथ रिफ्लैक्स कम होने पर जिस तरह अपने खेल में बदलाव लाए और सबसे बड़ी बात, ग्लैमर और पैसे की बरसात के बावजूद जिस तरह अपने पैर जमीन पर बनाए रखा।

बीस साल तक खेल में कोई सिर्फ अपनी सोलह बरस की उम्र की प्रतिभा और ऊर्जा के सहारे नहीं टिक सकता, उसके लिए और भी कुछ चीजों की जरूरत होती है। सचिन ने यह दिखाया कि रेस में लंबे वक्त तक टिके रहने के लिए क्या करना होता है। इस मायने में सचिन न केवल खिलाड़ियों, बल्कि तमाम क्षेत्रों में नई ऊंचाइयां पाते भारतीय नौजवानों के लिए प्रेरणा भी हैं और आदर्श भी।

जब हम सचिन कह रहे हैं तो इसमें सचिन के युग के दूसरे नायक भी शामिल हैं, सौरव गांगुली इस दौर के कप्तान थे, जो सही अर्थो में पूरी तरह भारतीय कप्तान थे, जिन पर प्रांतीय या क्षेत्रीय भेदभाव का कभी कोई आरोप नहीं लग सकता। राहुल द्रविड़ हैं, जो बिना शिकायत या शोर के दीवार की तरह अड़े रह सकते हैं, और अनिल कुंबले हैं जो करियर के अंत तक कुछ न कुछ नया सीखते-करते रहे। सचिन इस युग के प्रतिनिधि हैं और सबसे बड़े प्रतीक।

भारत में यह दौर सचमुच संभावनाओं के विस्फोट और उनके उपलब्धियों में बदलने का दौर है। सचिन ने जब क्रिकेट खेलना शुरू किया था, तब भारत की विकास दर कितनी थी और अब कितनी है? तब क्या कोई सोच सकता था कि इतनी जल्दी एक ऐसा वक्त आएगा, जब यह कहा जाएगा कि वैश्विक आर्थिक संकट से उबरने की चाबी भारत जैसे देशों के पास है। अगर हमें इस दौर का प्रतीक कोई चुनना है तो वह सचिन ही हो सकते है, जिनमें देश के तमाम गांव, कस्बों शहरों के नौजवान अपना अक्स ढूंढ़ते हैं। अगर सचिन कहते हैं कि वे भारतीय पहले हैं, मराठी बाद में, तो इसमें गलत क्या है?

लेखक दिल्ली हिन्दुस्तान में एसोशिएट एडीटर हैं

rajendra.dhodapkar@hindustantimes.com

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