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प्रसन्नता ईश्वरीय वरदान

सुख अपने में ही रहता है। कहीं बाहर नहीं। जो हर परिस्थिति में आनंदित रहना सीख लेता है, उनको सारा संसार आनंदमय प्रतीत होता है। प्रसन्न रहने वाले स्वत: ही सबसे आत्मीयता विकसित कर लेते हैं। दूसरों के दुर्गुणों को छोड़कर सद्गुणों को देखें। आत्मीयता पाकर व्यक्ति स्वयं ही दुगरुणों को छोड़ने की सोचने लगता है और इससे हमारी प्रसन्नता द्विगुणित हो जाती है।
  
जैसे के साथ तैसा करने की मनोवृत्ति रखने से शत्रु को दुखी करने के बजाय स्वयं दुखी बन जाते हैं। ईसा ने कहा था ‘शत्रुओं को बार-बार क्षमा कर दो और रक्तचाप, हृदयरोग आदि कई व्याधियों से दूर रहो।’ यदि हमें जीवन से प्यार है तो प्रसन्न रहने के उपाय खोजने होंगे। प्रसन्नता से परिपूर्ण व्यक्तित्व को हर पदार्थ सुंदर और आनंद देने वाला प्रतीत होता है।
  
किसी श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति में व्यस्त रहें तो विवाद, पश्चाताप, घृणा आदि के लिए समय ही नहीं बचता। हमें अपना मानसिक स्तर ऊंचा उठाना होगा। एक दार्शनिक का कथन है- ‘हमारे शरीर का दुख तो दूर हो सकता है, किन्तु हमें कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे हमारा मस्तिष्क बीमार हो जाए, क्योंकि उसे ठीक करना बहुत कठिन है।’ मस्तिष्क बीमार तब होता है, जब हमारा जीवन जीने का तरीका गलत हो। इससे हमारी खुशियां समाप्त हो जाती हैं।
   
अधिक प्रसन्नता दूसरों को देने में है। जितने अधिक लोगों के होठों पर हम हंसी लाते हैं, उतनी ही हमें आंतरिक प्रसन्नता मिलती है जिससे अंतरात्मा तृप्ति और शांति से भर उठता है और फिर सारी दुनिया इतनी सुन्दर दिखती है जैसे पहले कभी नहीं दिखी।
   
प्रसन्नता मनुष्य के लिए शाश्वत वरदान है। उसकी यह स्वाभाविक प्रवृत्ति भी है। दुख तो बनावटी और ओढ़ा हुआ स्वरूप है। हमारे चारों ओर बिखरी प्रसन्नता को यदि आत्मसात किया जा सके, व्यावहारिक जीवन में उतारा जा सके तो निश्चित ही मानव जीवन सार्थक एवं सफल माना जाएगा।

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