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धुआं-धुआं जिन्दगी

आलिमों ने जोड़-घटा कर रेकार्ड पेश किया है कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री सर विंस्टन चर्चिल अपने जीवन काल में तीन लाख सिगार पी गए। फिर भी इंडिया इज ग्रेट। चर्चिल के रेकार्ड को अपने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने तोड़ा। चर्चिल जितना पी गए, उस से कई हजार गुना कोड़ा खा गए। खाना-पीना ही जिन्दगी है। बाकी सब इल्ले-तिल्ले है। अपनी रेलवे के ही एक खान-पान अफसर इतना खान-पान कर गए कि अब जेल में मच्छर सब वसूल रहे हैं। खैर जिक्र चर्चिल के सिगार के धुएं का छिड़ा था। एक जमाना था कि मैं बेइन्तहा सिगरेट पिया करता था। मुंह हर वक्त फैक्ट्री की चिमनी बना रहता था। गले का ऑपरेशन हुआ, सिगरेट छूटी और आज यह आलम है कि कोई पास बैठकर पीता है तो चेहरे पर नकाब डाल लेने को दिल करता है।

अपन की सरकार ने पब्लिक प्लेस में सिगरेट पीने पर प्रतिबंध लगाया। और ज्यादा पी जाने लगी। दफ्तरों में पान मसाले और गुटखे पर प्रतिबंध लगा। दीवारों पर और ज्यादा पीक कृतियां बनने लगीं। पोलीथीन पर प्रतिबंध लगा। सब्जी और दारू तक पोलीथीन में बिकने लगी। सरकार और पब्लिक अपने-अपने काम पर लगे हैं। तुम बाल फेंकों, हम कैच कर के स्टेडियम से बाहर फेंक दें। सरकार एक मुस्तैद चीज का नाम है। पैकिटों पर वार्निग छपवा दी कि सिगरेट से जान और सेहत को खतरा है। काम खत्म। अब चाहे भूख से मरो या कैंसर से।

हमने अपना काम पूरा कर दिया। कुएं की गहराई मत नापो, अपनी रस्सी देखो। फूंकते रहो फकाफक। कुछेक साल पहले फिल्म ‘स्वदेश’ के संवाद लिखने के सिलसिले में मैं आशुतोष गोवारीकर के ऑफिस में शाहरुख खान के साथ बैठा स्क्रिप्ट पर बातचीत कर रहा था। इतने में शाहरुख ने न जाने कितनी विदेशी सिगरेट फूंक डालीं। मैंने टोका तो मुस्करा कर यों देखा गोया कह रहे हों- ‘छूटती नहीं काफिर यह मुंह की लगी हुई।’ 

जवानी के आलम में एक फिल्म की शूटिंग देख रहा था। दादा मुनि (स्व. अशोक कुमार) को डॉक्टर की ताकीद थी कि एक-एक घंटे बाद आधी सिगरेट पिया करो। उनकी पत्नी शोभा जी शूटिंग में सिगरेट का टिन अपने पास रखती थीं। दादा मुनि ने मुझे पीते देख कर एक सिगरेट ले ली और सेट के पीछे जा कर फूंक ली। फिर सेट पर आकर पत्नी से बोले- ‘सिगरेट सचमुच खराब चीज है। एक घंटा हो गया। लाओ आधी।’ यही हाल धुएं और गुटखे को लेकर सरकारी आदेशों का है। चिकनफ्राई भी खा रहे हैं और मुंह पोंछ कर हनुमान चालीसा भी पढ़े जा रहे हैं।

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