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चोटों को चूम-चूम कर चोटियां चढ़ता गया

लगभग 7-8 महीने पहले की बात है। मैं चंडीगढ़ में था। पंजाब गोल्ड कप हॉकी कवर करने गया हुआ था। उसी समय एक दिन मुझे चंडीगढ़ के सेक्टर-22 स्थित एक फिजियोथैरेपी सेंटर पर जाने का मौका मिला। मेरे साथ मेरे एक मित्र भी थे। उनकी कमर में कुछ दर्द था। वे डॉक्टर को दिखाना चाहते थे। क्लीनिक पर गए तो देखा डॉक्टर के साथ सचिन तेंदुलकर की तस्वीरें लगी हुई हैं। पता चला इस क्लीनिक का उद्घाटन खुद मास्टर ब्लास्टर ने ही किया था।

जानने पर पता चला कि ये तो वहीं डॉक्टर हैं जो 1996 से लेकर 1999 तक भारतीय क्रिकेट टीम के फिजियो थे। जी हां, डॉक्टर रविन्दर चड्ढा। डॉ. चड्ढा खुद भी एक क्रिकेटर रहे हैं। काफी समय तक हरियाणा रणजी टीम के कप्तान भी रह चुके हैं। राष्ट्रीय चयनकर्ता भी रहे हैं डॉ. चड्ढा।

काफी गप-शप हुई। इस दौरान सचिन के बारे में चर्चा भी हुई। डॉक्टर साहब सचिन के क्रिकेट के प्रति समर्पण के बारे में बता रहे थे। कह रहे थे। सचिन तो जैसे क्रिकेट को ही जीते हैं। सोते-जागते बस क्रिकेट के बारे में ही सोचते रहते हैं।

सचिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बीस साल पूरे कर चुके हैं। डॉ. चड्ढा सचिन के काफी करीबी रहे हैं। सचिन को दो दशक के करियर में चोटों से भी काफी जूझना पड़ा। हमने डॉ. चड्ढा को फोन लगाया तो वे फिर से सचिन के किस्से सुनाने लगे। कहते हैं, सचिन ने शारजाह में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शतक जमाया था। रात को वह मेरे कमरे में आया। कहने लगा, डॉक्टर साहब मैं कल तो किसी भी सूरत में नहीं खेल पाऊंगा। बहुत ज्यादा दर्द है। मैंने उन्हें समझाया, घबराओ नहीं, लम्बा खेल कर आए हो इसलिए यह सब हो रहा है। काफी देर तक बर्फ की सिकाई आदि करने के बाद वे थोड़ा रिलेक्स महसूस करने लगा। दिन-रात का मैच था। इसलिए दूसरे दिन सुबह भी थोड़ा-बहुत सिकाई का मौका मिला। विल पॉवर तो गजब की है ही सचिन में। उतर पड़े मैदान में।

जो खिलाड़ी पिछले 20 साल से लगातार क्रिकेट खेलता आ रहा हो, उसके लिए खुद को हमेशा पूरी तरह फिट बनाए रखना काफी मुश्किल है। फिर 2001 से तो सचिन को हर साल थोड़े-बहुत समय के लिए क्रिकेट से दूर रहना पड़ा है। लेकिन उन्होंने हमेशा शानदार वापसी की है। उनका क्रिकेट का जूनुन और समर्पण ही उन्हें बार-बार मैदान की ओर खींच लाता है। वरना कोई और खिलाड़ी होता तो शायद खेल को अलविदा कह देता। उनके इसी जुनून और समर्पण के चलते ही तो लोग उन्हें मास्टर ब्लास्टर कहते हैं। हर चोट के बाद लोग यही सोचते रहे कि सचिन का क्रिकेट करियर खत्म। लेकिन हर चोट के बाद सचिन में क्रिकेट के प्रति समर्पण और ज्यादा नजर आया और उनके रिकॉर्ड यह कहानी खुद ब खुद कहते हैं।

मैं बचपन से ही क्रिकेट का क्रेजी रहा हूं। मैं ही क्या, हर भारतीय का क्रिकेट के प्रति इसी तरह लगाव रहता है। गावसकर के बाद मेरे सबसे फेवरेट खिलाड़ी मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ही हैं। पिछले 20 साल से मैं उन्हें खेलते देखता आ रहा हूं। उनका खेलने का स्टाइल जरूर बदल गया है लेकिन जुनून आज भी वही है। हाल ही में हैदराबाद में खेली 175 रन पारी ने यह साफ कर दिया। पहले वह धूमधड़ाका करते थे लेकिन आज वे एक स्ट्रेटेजी प्लेयर ज्यादा दिखाई देते हैं। हो सकता है अपनी उम्र और स्वास्थ्य से तालमेल बिठाने के लिए उन्होंने यह रुख अपनाया हो। फिर भी कभी-कभी उनमें पहले जैसा जोश भी नजर आता है।

सचिन अपनी कमजोरी को ताकत में बदलने वाले शख्स हैं। राह की रुकावटों को उन्होंने सफलता में बदला। संकट की घड़ी को अच्छे अवसर में ढालने का हुनर उन्हें आता है। 1989 में पाकिस्तान के खिलाफ अपने पहले टेस्ट में वह सस्ते में आउट हुए। पाकिस्तान का तेज आक्रमण तब इस सबसे कम उम्र के क्रिकेटर की परीक्षा लेने के लिए हर कोशिश में लगा था। पाकिस्तान की पेस बैटरी इस लड़के के शरीर को निशाना बना रही थी। तभी वकार यूनुस की एक बाउंसर उनके नाक पर जाकर लगी। खून का फव्वारा बहने लगा। अली ईरानी स्ट्रेचर ले कर आए। ऐसे लगा अब शायद यह लड़का आगे क्रिकेट नहीं खेल पाएगा। लेकिन ये क्या? सचिन तो स्ट्रेचर से कूद पड़े और बल्लेबाजी के लिए क्रीज पर पहुंच गए। उनकी नाक में रुई घुसी हुई थी। वकार की अगली यॉर्कर गेंद को उन्होंने सीमा रेखा के बाहर पहुंचा कर उन्होंने अपने इरादे जतला दिए। दिखला दिया कि 16 साल का यह लड़का क्रिकेट का महानायक बनने के लिए मैदान पर उतरा है।

सचिन को खुद भी अपने करियर में दो बार ही ऐसा लगा कि वह शायद अब आगे क्रिकेट नहीं खेल पाएंगे। पहला तो पाकिस्तान के खिलाफ पहले ही टेस्ट में जब उन्होंने सिर्फ 15 रन बनाए थे। लेकिन यहां उन्हें आगे अवसर मिला। दूसरी बार जब टेनिस एल्बो की चोट से परेशान थे तब उन्हें लगा कि अब शायद उनका क्रिकेट करियर आगे नहीं चल पाएगा। कुछ दिन पहले उन्होंने कहा भी था, जब मैं टेनिस एल्बो की चोट से पीड़ित था उस समय मैं रातों को सो नहीं पाता था। बहुत मुश्किल समय था वह। मैं गेंदों को हिट नहीं कर पाता था। मुझे लगा कि मैं अब आगे क्रिकेट नहीं खेल पाऊंगा।

2010 दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों की आयोजन समिति के मेडिकल आयोग के चेयरमैन डॉ. पीएसएम चंद्रन को स्पोर्ट्स इंजुरी में विशेषज्ञता हासिल है। सचिन के चोटों से भरे करियर के बारे में हमने उनसे भी बात की। उन्होंने कहा, शुरू में सचिन को बहुत ज्यादा चोट नहीं लगती है। युवा थे। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई वैसे-वैसे चोटों से भी उनका सामना होता गया। वैसे भी इतने लम्बे समय तक जब कोई खिलाड़ी खेलता रहता है तो उसका चोटों से सामना होना स्वाभाविक है। वैसे भी यह देखना जरूरी होता है कि कैसे कोई व्यक्ति अपनी इन चोटों से पार पाता है।

सचिन जैसे खिलाड़ी को तो हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं। फिर वे खुद भी खेल के प्रति इतने समर्पित हैं कि अपना खयाल खुद-ब-खुद रखना जानते हैं। खिलाड़ी का समर्पण, संयम और समय से सही इलाज उसे पूरी तरह से फिट करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि खिलाड़ी अपने चोट को कितना सीरियस लेता है और उसे समय पर और सही ट्रीटमेंट मिलता है कि नहीं।

आम इनसान और सचिन जैसे स्टार खिलाड़ियों में यही फर्क है। सचिन की कोई भी चोट नई नहीं थी। कमर दर्द हो, कंधे की चोट हो, मांसपेशियों में खिंचाव हो या फिर टेनिस एल्बो की समस्या। इन जैसी समस्याओं से आम आदमी भी पीड़ित रहता है। देश में 5 में से 3 आदमी इन समस्याओं से पीड़ित होते हैं लेकिन क्योंकि इन आम आदमियों को सही ट्रीटमेंट नहीं मिल पाता या फिर कहें कि वे इतने सक्षम नहीं होते कि अपना इलाज करा सकें इसलिए वे दर्दनिवारक दवाओं आदि से ही अपना काम चला लेते हैं। हां, एक खिलाड़ी के लिए 100 प्रतिशत नहीं बल्कि 120 प्रतिशत फिट होना जरूरी होता है इसलिए खिलाड़ी को सही समय पर और सही ट्रीटमेंट मिलना बहुत जरूरी होता है। 

पिछले दस साल में ऐसा कोई साल नहीं गया जब सचिन को चोट के चलते कुछ न कुछ समय के लिए क्रिकेट से दूर न रहना पड़ा हो। हां, उनके अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर के पहले 10 साल में उन्हें चोटों से ज्यादा नहीं जूझना पड़ा। इस दौरान शायद ही ऐसा कोई साल रहा हो जब वे टीम से अलग हुए हों। हां, अगले दस साल उनके लिए मुश्किलों भरे रहे। यह दिखाता है कि उम्र के साथ-साथ शरीर भी थकने लगता है। यहां खिलाड़ी को खुद को पूरी तरह से फिट रखना जरूरी होता है। पिछले दस साल में सचिन को जब-जब चोट लगी उन्होंने क्रिकेट से खुद को अलग कर सही समय पर सही ट्रीटमेंट कराया यही कारण है कि वे दो दशक के बाद भी क्रिकेट के मैदान पर जमे हुए हैं। खुदा उन्हें फिट बनाए रखे और वे भारत को उपमहाद्वीप में होने वाले विश्व कप में चैंपियन बनाए यही उनकी भी और दुनियाभर के क्रिकेटप्रेमियों की भी ख्वाहिश होगी।

क्या है टेनिस एल्बो
कोहनी में हड्डी की जोड़ने वाली नस का कमजोर पड़ जाना। टेनिस एल्बो को डॉक्टर लेटरल एपिकोंडीलिटिस भी कहते हैं। टेनिस एल्बो की चोट खिलाड़ियों में आम है। इसके नाम पर गौर करें तो साफ लगता है कि यह टेनिस खिलाड़ियों में ज्यादा होती है। इसमें खिलाड़ी को कोहनी की जॉइंट में हल्का-हल्का दर्द महसूस होता है। अगर दर्द ज्यादा बढ़ जाए तो यह बहुत ज्यादा परेशान करता है। जैसा कि सचिन तेंदुलकर के साथ हुआ और उन्हें लंदन जा कर इसका ऑपरेशन कराना पड़ा। खिलाड़ी को ही नहीं यह आम गृहिणियों में भी देखा जाता है जो कि घर में कपड़े निचोड़ती हैं। भारी चीज उठाने से भी यह दर्द उठ जाता है। क्योंकि टेनिस खिलाड़ी एक ही हाथ में हैवी टेनिस रैकेट पकड़े होते हैं और उसी से हिट करते हैं इसलिए भी यह दर्द होता है। सचिन तेंदुलकर भी हैवी बैट से खेलते थे इसलिए उन्हें इस समस्या से रूबरू होना पड़ा। हां, बाद में सचिन ने विशेषज्ञों की सलाह पर अपने बल्ले का वजन कम किया था।

क्या है इलाज
पूरी तरह से रेस्ट। दर्द निवारक दवाएं और क्रीम लगाना और डॉक्टर की सलाह से एक्सरसाइज। ज्यादा दर्द होने पर डॉक्टर जहां दर्द होता है वहां हाइड्रोकोर्टिसोन का इंजेक्शन भी दे देते हैं। यह इंजेक्शन हमेशा डॉक्टर की सलाह से लगाया जाना चाहिए, गलत जगह इंजेक्शन लगने से इंफेक्शन का खतरा भी रहता है। हां, स्थिति ज्यादा बिगड़ने की स्थिति में ही ऑपरेशन करना पड़ता है जैसा कि सचिन तेंदुलकर के केस में हुआ।

डॉ. पीएसएम चंद्रन
(2010 कॉमनवेल्थ खेलों के मेडिकल कमीशन के चेयरमैन)
खिलाड़ियों की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है वैसे-वैसे उन्हें चोटों से भी ज्यादा रूबरू होना पड़ता है। उम्र के साथ शरीर की रिसिसटेंम कम होने लगती है। अगर खिलाड़ी का समय से और सही ट्रीटमेंट मिल जाता है तो वह फिर से फिट होकर खेलने लगता है। हां, खुद खिलाड़ी को इसके लिए समर्पित होना बहुत जरूरी होता है। रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम परफेक्ट होता है तो खिलाड़ी जल्दी फिट हो जाता है।

डॉ. रविन्दर चड्ढा
(भारतीय क्रिकेट टीम के फिजियो रह चुके हैं)
यहां यह देखना जरूरी होता है कि खिलाड़ी मानसिक रूप से कितना सुदृढ़ है। वह अपनी एक्सरसाइज आदि को पूरी तरह से फॉलो कर रहा है या नहीं। आम इनसान बेशक 100 प्रतिशत फिट हो जाए लेकिन खिलाड़ी का 120 प्रतिशत फिट होना जरूरी होता है। खिलाड़ी का समर्पण और हौसला ही उसे आम आदमी से अलग बनाता है। सचिन में यह समर्पण और हौसला कूट-कूट कर भरा है।

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