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प्लूरिसी

फेफड़ों की सुरक्षा के लिए प्रकृति ने उन पर पतली दोहरी झिल्ली का एक खोल चढ़ाया हुआ है। यह प्लूरा है, जिसकी एक तह फेफड़ों के बाहरी भाग पर चढ़ी रहती है और दूसरी पसलियों के भीतरी भाग पर। प्लूरा में इसी झिल्ली में सूजन आ जाती है। यह सूजन तीन किस्म की हो सकती है- शुष्क, नम प्लूरिसी और एम्पाइमा। 

कारण : शुष्क प्लूरिसी फेफड़े के बैक्टीरियल संक्रमण या छाती की पेशियों के खास वायरल संक्रमण से जुड़ी होती है। कुछ मामलों में फेफड़ों की टीबी, ट्यूमर और खून की सप्लाई कटने से भी प्लूरा की तहों में सूजन आती है। प्लूरा में पानी भरने का सबसे आम कारण टीबी है। निमोनिया, ट्यूमर, कैंसर, पेट के कुछ खास अंगों की सूजन जैसी बीमारियों में यह तकलीफ हो सकती है। दिल, गुर्दो और जिगर में से किसी एक के ठीक से काम न करने पर भी प्लूरा में पानी भर सकता है। चोट से प्लूरा में खून एकत्र होने व संक्रमण से भी एम्पाइमा हो सकता है।

प्लूरिसी के लक्षण 
हर रोगी में इसके अलग लक्षण होते हैं। शुष्क प्लूरिसी का खास लक्षण तीखा दर्द है जो सांस लेने-छोड़ने पर होता है। यह दर्द धीरे-धीरे सांस लेने पर कम होता है। इसके मुख्य लक्षण बुखार, खांसी, भूख न लगना और वजन कम होना हैं।  एम्पाइमा में भी ऐसे ही कुछ लक्षण दिखते हैं।

कैसे करते हैं पुष्टि : छाती के एक्स-रे या अल्ट्रासांउड में प्लूरा में पानी और मवाद के लक्षण दिख जाते हैं। कारण जानने के लिए छाती में सुई से नमूना निकालकर जांच की जाती  हैं।

इलाज : दर्द से राहत के लिए गरम सेंक, गरम पानी की बोतल या इलैक्ट्रिक हीटिंग पैड असरकारी है। ऐंटिबायटिक  दवाएं देकर मवाद सुखाने का प्रयास किया जाता है। नियमित श्वास-व्यायाम करने से भी फेफड़े को खुलने में मदद मिलती है। बड़ा गुब्बारा फुलाने जैसा साधारण व्यायाम इसमें भारी मदद कर सकता है।

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